संपादकीय
16 Jun, 2026

विदेशी AI की बैसाखी छोड़ो, अब भारत को चाहिए अपना प्लेटफॉर्म, अपना कोड, अपना कल

एआई तकनीक पर बढ़ती वैश्विक निर्भरता के बीच भारत के लिए स्वदेशी प्लेटफॉर्म, डेटा सुरक्षा, कंप्यूटिंग क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करना रणनीतिक आवश्यकता के रूप में उभर रहा है।

नई दिल्ली, 16 जून।

विदेशी प्लेटफॉर्म की बैसाखी अब तोड़नी होगी, क्योंकि लंबी दौड़ में बैसाखी के सहारे चलने वाला कभी विजेता नहीं बनता। भारत को अब गिरना नहीं, बल्कि अपने दम पर अपने प्लेटफॉर्म और अपने भविष्य की ओर दौड़ना है। अमेरिका की एक अग्रणी AI कंपनी के शक्तिशाली मॉडल को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकारी आदेश से रातोंरात बंद कर दिया गया। इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि जिस तकनीक पर दुनिया अपनी अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा का भविष्य टिका रही है, उसकी चाबी उसके निर्माता के हाथ में ही रहती है।

भारत आज डिजिटल उपलब्धियों पर गर्व करता है, लेकिन जिन क्लाउड सेवाओं, मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम और AI प्लेटफॉर्म पर हमारी व्यवस्था निर्भर है, उनमें अधिकांश विदेशी कंपनियों के नियंत्रण में हैं। यह स्थिति डिजिटल आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि डिजिटल किराएदारी है। किराएदार को कब घर खाली करना पड़े, इसका निर्णय उसका मालिक करता है।

यूक्रेन युद्ध के दौरान वैश्विक तकनीकी प्रतिबंधों ने दिखा दिया कि आधुनिक संघर्षों में तकनीक कितनी निर्णायक भूमिका निभाती है। यदि भविष्य में भारत पर किसी प्रकार का तकनीकी प्रतिबंध लगाया गया तो सरकारी डेटा, स्टार्टअप इकोसिस्टम और मोबाइल आधारभूत संरचना पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। AI अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि बिजली की तरह बुनियादी आवश्यकता बन चुका है। खेती, चिकित्सा, शिक्षा और रक्षा - हर क्षेत्र में इसकी भूमिका बढ़ रही है। यदि इसका नियंत्रण विदेशों में होगा तो हमारी रणनीतिक स्वतंत्रता भी सीमित रहेगी।

डेटा को नया तेल कहा जाता है, लेकिन भारत अपने विशाल डेटा संसाधनों का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहा। विदेशी कंपनियां भारतीय डेटा से अपने मॉडल विकसित कर रही हैं और हम उन्हीं सेवाओं के लिए भुगतान कर रहे हैं। यह निर्भरता भविष्य में और गहरी हो सकती है। दूसरी चुनौती यह है कि विदेशी AI मॉडल किस डेटा पर प्रशिक्षित हैं, उनमें किस प्रकार का पूर्वाग्रह है और वे संवेदनशील विषयों पर क्या दृष्टिकोण अपनाते हैं, इसकी पारदर्शिता सीमित है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा का प्रश्न स्वाभाविक है।

सबसे बड़ा खतरा यह है कि सस्ती विदेशी सेवाओं की उपलब्धता स्वदेशी नवाचार को कमजोर कर सकती है। यदि हम केवल उपभोक्ता बने रहे तो वैश्विक तकनीकी नेतृत्व कभी हासिल नहीं कर पाएंगे। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब हम उपयोगकर्ता से आगे बढ़कर निर्माता बनें।

भारत के पास प्रतिभा, डेटा और विशाल बाजार - तीनों की ताकत मौजूद है। दुनिया की प्रमुख तकनीकी कंपनियों में भारतीय विशेषज्ञ महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं। देश के पास करोड़ों स्मार्टफोन उपयोगकर्ता, अनेक भाषाएं और विविध सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ा अनमोल डेटा है। यदि इन संसाधनों का सही उपयोग किया जाए तो भारत अपने लिए विशिष्ट AI मॉडल विकसित कर सकता है।

सरकार द्वारा AI मिशन, राष्ट्रीय कंप्यूटिंग क्षमता और भारतीय भाषाओं पर आधारित पहलें सही दिशा में कदम हैं, लेकिन इनकी गति और व्यापकता बढ़ाने की आवश्यकता है। भारत को कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों के लिए भारतीय संदर्भों पर आधारित स्वदेशी AI मॉडल विकसित करने होंगे। गैर-व्यक्तिगत डेटा का सुरक्षित राष्ट्रीय ढांचा तैयार कर अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना चाहिए, साथ ही डेटा संरक्षण कानूनों को प्रभावी बनाकर भारतीय नागरिकों के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।

AI के युग में कंप्यूटिंग शक्ति भी रणनीतिक संसाधन बन चुकी है। देश को उच्च क्षमता वाले सुपरकंप्यूटर, स्वदेशी प्रोसेसर और बड़े GPU नेटवर्क के निर्माण में युद्धस्तर पर निवेश करना होगा। विदेशों में कार्यरत भारतीय AI विशेषज्ञों को आकर्षक अवसर देकर वापस लाना और अनुसंधान संस्थानों को अधिक स्वतंत्रता देना भी आवश्यक है।

आत्मनिर्भरता केवल उत्पादों के निर्माण तक सीमित नहीं हो सकती। चिप से लेकर चैटबॉट, क्लाउड से लेकर सोर्स कोड और सॉफ्टवेयर से लेकर सुरक्षा प्रणाली तक संपूर्ण तकनीकी श्रृंखला में स्वदेशी क्षमता विकसित करनी होगी। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने तकनीक का नेतृत्व किया, उन्होंने भविष्य की दिशा भी तय की। इसलिए भारत को अब सेवा प्रदाता से उत्पाद निर्माता बनने की यात्रा तेज करनी होगी। जिस दिन देश का किसान अपनी भाषा में भारतीय AI से समाधान पाएगा, उसी दिन डिजिटल आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ साकार होगा।

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