भोपाल, 10 जुलाई।
भोपाल को अगर तालों का शहर कहा जाता है, तो उसकी धड़कन है बड़ा तालाब, जिसे हम ऊपरी झील के नाम से जानते हैं। यह सिर्फ पानी का तालाब नहीं है। यह इस शहर की पहचान है, लाखों लोगों की प्यास बुझाने वाला स्रोत है, शहर के फेफड़े की तरह काम करता है और सबसे बड़ी बात, यह हमारी अमूल्य धरोहर है। लेकिन आज उसी धरोहर पर सबसे बड़ा हमला हो रहा है और हम सब चुपचाप उसे देखते जा रहे हैं। हम बात कर रहे हैं उन अवैध निर्माणों की, जो तालाब के 50 मीटर के दायरे में कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं। होटल हैं, रेस्टोरेंट हैं, निजी बंगले हैं, दुकानें हैं और इन सबके पीछे एक ही सोच है—पैसा कमाओ और नियमों को ताक पर रख दो।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने वर्ष 2022 में स्पष्ट आदेश दिया था कि बड़े तालाब के 50 मीटर के दायरे में जितने भी अवैध निर्माण हैं, उन्हें तत्काल हटाया जाए। एनजीटी ने साफ कहा था कि यह क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है और यहां एक ईंट भी रखना अपराध है। आदेश आया, फाइलें बनीं, सर्वे हुआ और फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में चला गया। सर्वे में कुल 347 अवैध निर्माण चिन्हित हुए। जिला प्रशासन ने भी स्वीकार किया कि ये निर्माण अवैध हैं और इन्हें हटाया जाना चाहिए। लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी केवल 57 निर्माण ही हटाए जा सके हैं, जबकि 290 निर्माण आज भी उसी जगह खड़े हैं, शान से अपना कारोबार कर रहे हैं और तालाब को भीतर ही भीतर खोखला कर रहे हैं। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि हमारी व्यवस्था में कानून का कितना सम्मान है, एनजीटी जैसे सर्वोच्च पर्यावरणीय न्यायाधिकरण के आदेश की कितनी कीमत है और भोपाल प्रशासन के लिए इस धरोहर का महत्व आखिर कितना रह गया है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ये निर्माण क्यों हुए। असली सवाल यह है कि निर्माण होने के बाद तीन साल तक इन्हें हटाया क्यों नहीं गया? जब 50 मीटर का प्रतिबंधित दायरा तय है, तो वहां होटल कैसे बन गए? जब सर्वे में सब कुछ सामने आ गया, तो बुलडोजर क्यों नहीं चला? मामला एनजीटी में लंबित है, सुनवाई चल रही है और प्रक्रिया जारी है, लेकिन क्या प्रक्रिया के नाम पर हम एक झील को मरने दें? क्या सुनवाई के नाम पर हर दिन नए अवैध निर्माण खड़े होने दें? जमीन पर जाकर देखिए। एफटीआई क्षेत्र के पास आज भी कई अवैध निर्माण खड़े हैं। भोपाल विकास प्राधिकरण की जमीन पर अतिक्रमण हो रहा है। रात के समय ट्रक आते हैं, निर्माण सामग्री गिरती है और सुबह तक एक नई दीवार खड़ी हो जाती है। शिकायत कीजिए तो जवाब मिलता है कि जांच होगी, लेकिन जांच के नाम पर केवल फाइलें आगे-पीछे होती रहती हैं। सबसे दुखद बात यह है कि इस खेल में छोटे लोग पिसते हैं और बड़े लोग बच जाते हैं। प्रशासन कहता है कि पहले बड़े और रसूखदार निर्माण हटाए जाएंगे, लेकिन हकीकत यह है कि बड़े निर्माण आज भी सबसे सुरक्षित हैं, क्योंकि उनके पीछे पैसा, पहुंच और राजनीतिक संरक्षण है।
हम पर्यावरण की बात करते हैं, स्मार्ट सिटी की बात करते हैं और स्वच्छ भारत की बात करते हैं, लेकिन अपनी सबसे बड़ी झील को नहीं बचा पा रहे हैं। यह कैसा विकास है, जहां तकनीक आगे बढ़ रही है और प्रकृति पीछे छूटती जा रही है? बड़ा तालाब भोपाल की जीवनरेखा है। यहीं से शहर को पेयजल मिलता है। यहां की जैव विविधता हजारों पक्षियों और जलीय जीवों का आश्रय है। भोपाल का मौसम भी काफी हद तक इसी तालाब की वजह से संतुलित रहता है। लेकिन 50 मीटर के दायरे में खड़े होते सीमेंट के जंगल तालाब में गंदगी बढ़ा रहे हैं, पानी के प्राकृतिक प्रवाह को रोक रहे हैं और उसके अस्तित्व पर संकट खड़ा कर रहे हैं। पर्यावरणविद लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अभी नहीं चेते, तो बड़ा तालाब भी अन्य तालाबों की तरह गंदे नाले में बदल सकता है। भोपाल के कई तालाब पहले ही अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। कोलार डैम पर पहले से दबाव है। यदि बड़ा तालाब भी संकट में आ गया, तो आने वाले वर्षों में भोपाल को गंभीर पेयजल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
हमारी प्राथमिकता क्या है? फाइलें, बैठकें और मुआवजे तथा पुनर्वास के नाम पर लीपापोती। तालाब को बचाना कभी हमारी प्राथमिकता बना ही नहीं। समाज के तौर पर भी हमारी जिम्मेदारी कम नहीं है। हममें से कितने लोग तालाब के किनारे जाकर देखते हैं कि वहां क्या हो रहा है? हममें से कितने लोग अवैध निर्माण के खिलाफ आवाज उठाते हैं? हमें झील के किनारे बैठकर चाय पीनी है, सेल्फी लेनी है, लेकिन झील को बचाने के लिए एक कदम आगे नहीं बढ़ना। अब समय आ गया है कि प्रशासन जवाब दे कि एनजीटी के आदेश के तीन साल बाद भी 290 अवैध निर्माण क्यों बचे हुए हैं। सरकार को यह तय करना होगा कि उसे वोट बैंक ज्यादा प्यारा है या भोपाल की धरोहर। साथ ही, 15 दिन के भीतर सभी चिन्हित अवैध निर्माण हटाने की समय-सीमा तय होनी चाहिए। जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही से ये निर्माण नहीं रुक सके, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और बड़ा तालाब के चारों ओर स्थायी निगरानी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में वहां एक भी अवैध ईंट न रखी जा सके।
बड़ा तालाब कोई सरकारी संपत्ति नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक धरोहर है। इसे बचाना सिर्फ प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सबका कर्तव्य है। इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा, यदि हमने अपनी आंखों के सामने अपनी सबसे बड़ी झील को मरते हुए देख लिया, यदि हमने एनजीटी के आदेश को केवल कागज का टुकड़ा बनकर रह जाने दिया और यदि हमने पैसों के आगे प्रकृति को हार जाने दिया। इसलिए अब और इंतजार नहीं, अब और बहाने नहीं, अब और सुनवाई नहीं—अब सिर्फ कार्रवाई चाहिए। बुलडोजर चलना चाहिए, कानून का राज स्थापित होना चाहिए और बड़ा तालाब को उसकी सांसें वापस मिलनी चाहिए। वरना आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी कि जब तुम्हारे पास मौका था, तब तुमने बड़ा तालाब क्यों नहीं बचाया? उस सवाल का हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा। बड़ा तालाब चीख रहा है, उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। प्रशासन बहरा बना हुआ है और हम सब उस बहरेपन के मौन सहभागी बन गए हैं। अगर अब भी नहीं जागे, तो वह दिन दूर नहीं जब भोपाल के नक्शे पर बड़ा तालाब सिर्फ एक नाम बनकर रह जाएगा।











.jpg)
