संपादकीय
10 Jul, 2026

नेतन्याहू ने भारत का नाम क्यों लिया? यह सिर्फ दोस्ती का बयान नहीं, बदलती विश्व राजनीति का संकेत भी है

नेतन्याहू की भारत संबंधी टिप्पणी ने इज़राइल-अमेरिका संबंधों, पश्चिम एशिया की बदलती रणनीति और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका को लेकर नई चर्चा को जन्म दिया।

यरुशलम, 10 जुलाई।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ बयान केवल सुर्खियां नहीं बनते, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों का संकेत भी देते हैं। हाल ही में इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ऐसा ही एक बयान दिया। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने कहा था कि अमेरिका ही इज़राइल का "एकमात्र शक्तिशाली सहयोगी" है। इसके जवाब में नेतन्याहू ने मुस्कराते हुए कहा, "हमारे कुछ और दोस्त भी हैं, जैसे भारत। वह छोटा देश नहीं है, वहां 1.4 अरब लोग हैं और हमें वहां से जबरदस्त समर्थन मिलता है।"

यह टिप्पणी सामान्य कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं थी। इसके पीछे पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति, अमेरिका-इज़राइल के रिश्तों में उभरती नई परिस्थितियां और भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका - तीनों छिपे हुए हैं।

दरअसल, हाल के महीनों में ईरान को लेकर अमेरिका और इज़राइल के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं। ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ युद्ध विराम और समझौते का रास्ता चुना, जबकि इज़राइल का मानना था कि यह समझौता ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं पर पर्याप्त अंकुश नहीं लगाता। इसी पृष्ठभूमि में जे.डी. वेंस ने कहा कि अमेरिका ही इज़राइल का सबसे बड़ा और प्रभावी सहयोगी है। नेतन्याहू का जवाब उसी सोच का प्रतिवाद था।

लेकिन सवाल यह है कि उन्होंने उदाहरण के तौर पर भारत का ही नाम क्यों लिया?

इसका पहला कारण दोनों देशों के बीच पिछले तीन दशकों में बना विश्वास है। 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद भारत और इज़राइल के रिश्ते लगातार मजबूत हुए हैं। आज दोनों देश रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, अंतरिक्ष तकनीक, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नवाचार जैसे अनेक क्षेत्रों में साथ काम कर रहे हैं। भारत इज़राइल के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में शामिल है और इज़राइल भारत को केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक भरोसेमंद सहयोगी मानता है।

दूसरा कारण बदलता हुआ पश्चिम एशिया है।

कुछ वर्ष पहले तक इज़राइल की सबसे बड़ी चिंता ईरान और उसके समर्थक संगठन थे। अब तस्वीर बदल रही है। तुर्किये क्षेत्रीय शक्ति के रूप में तेजी से उभर रहा है। चीन खाड़ी देशों में अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ा रहा है। अमेरिका भी पहले की तुलना में पश्चिम एशिया में सीमित भूमिका निभाना चाहता है। ऐसे माहौल में इज़राइल उन देशों के साथ संबंध और मजबूत करना चाहता है, जो लोकतांत्रिक हों, तकनीकी रूप से सक्षम हों और जिनकी वैश्विक स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही हो। भारत इन सभी कसौटियों पर खरा उतरता है।

नेतन्याहू का बयान अमेरिका के लिए भी एक संदेश था। उसका आशय यह नहीं था कि इज़राइल अमेरिका से दूरी बना रहा है, बल्कि यह था कि अब उसकी विदेश नीति केवल एक सहयोगी पर निर्भर नहीं रहेगी। वह बहुध्रुवीय दुनिया के अनुरूप अपने मित्रों का दायरा बढ़ा रहा है। भारत का नाम लेकर इज़राइल ने यह संकेत दिया कि भविष्य की रणनीतिक साझेदारियों में नई दिल्ली की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगी।

भारत के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी।

अवसर इसलिए क्योंकि इज़राइल अत्याधुनिक रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा, जल संरक्षण और कृषि नवाचार में दुनिया के अग्रणी देशों में है। भारत अपनी सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा सकता है। रक्षा खरीद के बजाय संयुक्त अनुसंधान, संयुक्त उत्पादन और नई तकनीकों का विकास दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई दे सकता है।

लेकिन चुनौती भी कम नहीं है।

भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत उसका संतुलन रही है। इज़राइल भारत का मित्र है, लेकिन ईरान भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। चाबहार बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देता है। खाड़ी देशों से भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा होता है और वहां लाखों भारतीय काम करते हैं। इसलिए भारत किसी एक पक्ष का स्थायी समर्थक बनने का जोखिम नहीं उठा सकता।

यही वजह है कि भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लिए हैं। आतंकवाद के खिलाफ उसने इज़राइल के साथ सहयोग बढ़ाया, वहीं फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी संवाद और दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन जारी रखा। यही संतुलन भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत है।

नेतन्याहू के बयान का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। यह दुनिया में भारत की बदलती छवि को भी दर्शाता है। आज भारत केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीक, रक्षा और कूटनीति का प्रमुख केंद्र बन चुका है। जी-20 की अध्यक्षता, इंडो-पैसिफिक में सक्रिय भूमिका, पश्चिम एशिया के साथ बढ़ते आर्थिक संबंध और वैश्विक मंचों पर बढ़ता प्रभाव यह बताते हैं कि भारत अब केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, किसी भी मित्रता की वास्तविक परीक्षा कठिन समय में होती है। यदि भविष्य में इज़राइल और ईरान या इज़राइल और तुर्किये के बीच तनाव बढ़ता है, तो भारत पर किसी एक पक्ष का समर्थन करने का दबाव भी बढ़ सकता है। ऐसे समय में भारत को भावनाओं के बजाय अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी होगी।

इसी में उसकी ताकत भी है और विश्वसनीयता भी।

नेतन्याहू का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल भारत की प्रशंसा नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की झलक दिखाई देती है। आज दुनिया एकध्रुवीय नहीं रही। अमेरिका, चीन, यूरोप, भारत और पश्चिम एशिया - सभी नए समीकरण बना रहे हैं। ऐसे समय में यदि इज़राइल सार्वजनिक रूप से भारत को अपना प्रमुख मित्र बताता है, तो यह भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा का संकेत अवश्य है।

लेकिन भारत के लिए इससे भी बड़ा संदेश यह है कि अब दुनिया उससे केवल मित्रता नहीं, बल्कि नेतृत्व, संतुलन और स्थिरता की भी अपेक्षा करने लगी है। यही नई भूमिका आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

-अपूर्व तिवारी

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