पन्ना, 10 जुलाई।
केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना है। इससे सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के नए अवसर पैदा होंगे। लेकिन किसी भी विकास परियोजना की सफलता केवल उसके आर्थिक लाभ से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उससे प्रभावित लोगों के साथ कितना न्याय हुआ।
पन्ना में छठे दिन भी विस्थापित आदिवासी और किसान जल सत्याग्रह पर डटे हैं। उफनती नदी में खड़े होकर वे केवल मुआवजे की नहीं, बल्कि सम्मानजनक पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने पात्र परिवारों के लिए 12.50 लाख रुपये तक के विशेष पुनर्वास पैकेज की घोषणा की है। यह सकारात्मक कदम है, लेकिन यदि आंदोलन जारी है तो स्पष्ट है कि समस्या केवल पैकेज की राशि नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन, पात्रता और विश्वास की भी है।
विस्थापन केवल जमीन छूटने का नाम नहीं है। इसके साथ लोगों की आजीविका, सामाजिक संबंध, संस्कृति और पीढ़ियों की यादें भी जुड़ी होती हैं। इसलिए पुनर्वास का अर्थ केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि लोगों को नई जगह पर सम्मानजनक जीवन की पूरी व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
यदि प्रदर्शनकारियों के आरोप सही हैं कि कुछ वास्तविक विस्थापित अब भी सूची से बाहर हैं या उन्हें अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिल रहा, तो सरकार को निष्पक्ष जांच कर समाधान निकालना चाहिए। वहीं यदि पुनर्वास पैकेज का लाभ सभी पात्र लोगों तक पारदर्शी तरीके से पहुंच रहा है, तो इसकी जानकारी भी खुले तौर पर सामने आनी चाहिए, ताकि भ्रम और अविश्वास दूर हो सके।
सरकार और आंदोलनकारियों के बीच टकराव किसी का हित नहीं साधेगा। संवाद ही सबसे प्रभावी रास्ता है। विकास और जनहित एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ चल सकते हैं, बशर्ते सरकार संवेदनशीलता दिखाए और प्रभावित लोगों को केवल आंकड़ों का हिस्सा नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया का सम्मानित भागीदार माने। यही किसी भी लोकतांत्रिक विकास मॉडल की सबसे बड़ी कसौटी है।










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