भोपाल, 10 जुलाई।
मध्यप्रदेश में नशे का कारोबार अब गंभीर सामाजिक और कानून-व्यवस्था की चुनौती बन चुका है। पुलिस हर महीने करोड़ों रुपये की ड्रग्स जब्त कर रही है, अवैध फैक्ट्रियां सील हो रही हैं और तस्कर गिरफ्तार भी हो रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद नशे का नेटवर्क लगातार फैलता जा रहा है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा, रतलाम, नीमच और मंदसौर जैसे शहरों से निकलकर यह जहर अब गांवों तक पहुंच चुका है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कार्रवाई लगातार हो रही है, तो नशे का कारोबार रुक क्यों नहीं रहा?
इस सवाल का जवाब उतना ही कड़वा है। केवल छोटे तस्करों की गिरफ्तारी से इस कारोबार पर रोक नहीं लग सकती। यदि कहीं करोड़ों रुपये की ड्रग्स बन रही है, कच्चा माल पहुंच रहा है और तैयार माल देशभर में भेजा जा रहा है, तो यह सब बिना किसी स्थानीय संरक्षण और तंत्र की मिलीभगत के संभव नहीं हो सकता। यही कारण है कि बार-बार बड़ी कार्रवाई के बाद भी कुछ समय में नया नेटवर्क खड़ा हो जाता है।
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। भोपाल में अलग-अलग समय पर 25 करोड़, 40 करोड़, 50 करोड़, 65 करोड़ और 55 करोड़ रुपये तक की एमडी ड्रग्स पकड़ी गई। वर्ष 2025 में डीआरआई ने भी बड़ी कार्रवाई करते हुए एक फैक्ट्री से भारी मात्रा में ड्रग्स बरामद की। हर साल जब्ती का आंकड़ा बढ़ रहा है, लेकिन बाजार में नशे की उपलब्धता कम नहीं हो रही। इसका सीधा अर्थ यही है कि जो माल पकड़ा जा रहा है, वह पूरे कारोबार का एक छोटा हिस्सा भर है, जबकि बड़ी खेप अब भी बाजार तक पहुंच रही है।
स्थिति और चिंताजनक इसलिए है क्योंकि अब मध्यप्रदेश में सिंथेटिक ड्रग्स बनाने की छोटी-छोटी फैक्ट्रियां भी स्थापित होने लगी हैं। गांवों में मामूली किराये पर मकान लेकर भीतर करोड़ों रुपये का अवैध कारोबार चलाया जाता है। हाल ही में सोनकच्छ क्षेत्र में पकड़े गए एक आरोपी के पास ड्रग्स बनाने की मशीनें, रसायन और पैकिंग सामग्री मिली। सवाल यह है कि कोई बाहरी व्यक्ति गांव में फैक्ट्री चलाता रहे और स्थानीय स्तर पर किसी को इसकी भनक तक न लगे, क्या यह सामान्य बात है?
मध्यप्रदेश की भौगोलिक स्थिति भी तस्करों के लिए अनुकूल मानी जाती है। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ से लगी सीमाएं ड्रग्स की आवाजाही को आसान बनाती हैं। नीमच और मंदसौर पहले से अफीम उत्पादन के लिए जाने जाते रहे हैं। अब इन इलाकों में सिंथेटिक ड्रग्स का खतरा भी बढ़ रहा है। रतलाम और उज्जैन जैसे शहर ट्रांजिट पॉइंट बनते जा रहे हैं, जबकि भोपाल और इंदौर बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में उभर रहे हैं।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि नशा अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा। गांवों, कस्बों और यहां तक कि स्कूलों और कॉलेजों के आसपास भी इसकी पहुंच बढ़ रही है। ऑनलाइन ऑर्डर, कूरियर और सोशल मीडिया के जरिए ड्रग्स की आपूर्ति का नया तंत्र विकसित हो चुका है। इसकी चपेट में आने वाला युवा केवल अपनी सेहत ही नहीं खोता, बल्कि उसका परिवार आर्थिक और सामाजिक संकट में भी फंस जाता है। नशे की लत अक्सर अपराध, हिंसा और पारिवारिक विघटन का कारण बनती है।
पुलिस और नारकोटिक्स एजेंसियां लगातार अभियान चला रही हैं, लेकिन केवल कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि ड्रग्स के पूरे नेटवर्क को तोड़ा जाए। जो लोग इस कारोबार को संरक्षण देते हैं, उनकी पहचान कर उनके खिलाफ भी उतनी ही सख्त कार्रवाई होनी चाहिए जितनी तस्करों के खिलाफ होती है। अवैध संपत्ति जब्त करने, वित्तीय जांच, ऑनलाइन नेटवर्क पर निगरानी और आधुनिक तकनीक के उपयोग के बिना इस लड़ाई में सफलता मिलना कठिन है।
इसके साथ ही समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। स्कूलों, कॉलेजों और पंचायत स्तर पर व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने होंगे। अभिभावकों को भी अपने बच्चों की संगत, व्यवहार और गतिविधियों पर सतर्क नजर रखनी होगी। नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
मध्यप्रदेश को ड्रग्स मुक्त बनाने के नारे वर्षों से लगाए जा रहे हैं, लेकिन अब केवल नारों से काम नहीं चलेगा। इस लड़ाई को दिखावे से निकालकर जमीनी स्तर पर निर्णायक अभियान बनाना होगा। यदि आज कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में इसकी सबसे बड़ी कीमत प्रदेश की युवा पीढ़ी चुकाएगी। तब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज के भविष्य का होगा।











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