नई दिल्ली, 10 जुलाई।
अब सरकारें भी मान रही हैं कि महिलाओं के सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी तरीका उनके हाथ में सीधे नकद सहायता पहुंचाना है। देश आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां नारी शक्ति का सम्मान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि सीधे बैंक खाते में पहुंचने वाली राशि से किया जा रहा है। हाल ही में आई एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि महिलाओं के लिए नकद सहायता की राशि बढ़ाई जाए और उसे सीधे बैंक खातों से जोड़ा जाए, तभी वास्तविक बदलाव संभव होगा। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जब महिला के हाथ में पैसा आता है, तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार के भविष्य पर खर्च करती है।
पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र की लाडकी बहन योजना, ओडिशा की सुभद्रा योजना और मध्यप्रदेश की लाड़ली बहना योजना ने इस सोच को जमीन पर उतारा है। इन योजनाओं के बाद जमीनी स्तर पर बदलाव साफ दिखाई देने लगा है। ओडिशा में महिलाओं के बैंक खातों में 84 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जबकि महाराष्ट्र में यह बढ़ोतरी 45 प्रतिशत रही। औसत बैंक बैलेंस में लगभग 6,885 रुपये की वृद्धि दर्ज की गई है। महाराष्ट्र में मासिक औसत बैलेंस 46 प्रतिशत और ओडिशा में 28 प्रतिशत बढ़ा है। ये आंकड़े बताते हैं कि नकद सहायता का सीधा असर घर की रसोई, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और परिवार की आर्थिक सुरक्षा पर पड़ रहा है।
रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने नकद सहायता को केवल भत्ता नहीं, बल्कि निवेश माना है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी महिला के हाथ में 1,000 रुपये आते हैं, तो उसका लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा परिवार पर खर्च होता है। वह बच्चों की फीस भरती है, दवाइयां खरीदती है, पोषण पर खर्च करती है और कई बार घर से छोटा-मोटा व्यवसाय भी शुरू कर देती है। यही कारण है कि विश्व बैंक से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक यह मानते हैं कि यदि महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी बढ़े, तो भारत की जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
हालांकि, इस रास्ते में कई चुनौतियां भी हैं। पहली चुनौती पहचान की है। आज भी लाखों महिलाएं ऐसी हैं, जिनका बैंक खाता [Aadhaar Redacted] से जुड़ा नहीं है या जिनके पास सक्रिय बैंक खाता ही नहीं है। दूसरी चुनौती सहायता राशि की है। महंगाई के इस दौर में 1,000 या 1,500 रुपये से किसी परिवार की जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं। इसलिए सहायता राशि को समय-समय पर महंगाई के अनुसार बढ़ाना आवश्यक है। तीसरी चुनौती जानकारी की है। गांवों में आज भी अनेक महिलाएं यह नहीं जानतीं कि उनके लिए कौन-सी योजनाएं उपलब्ध हैं और उनका लाभ कैसे लिया जाए।
रिपोर्ट ने इन समस्याओं के समाधान भी सुझाए हैं। सभी राज्यों में महिलाओं के लिए न्यूनतम नकद सहायता की एक समान व्यवस्था हो, ताकि कोई राज्य पीछे न रह जाए। हर पंचायत और आंगनवाड़ी में महिला सहायता केंद्र बनाए जाएं, जहां बिना किसी दलाल के योजनाओं की जानकारी और आवेदन की सुविधा मिले। इसके साथ ही नकद सहायता को कौशल विकास से भी जोड़ा जाए। जो महिलाएं प्रशिक्षण लें या स्वयं सहायता समूहों से जुड़ें, उन्हें अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि दी जाए, ताकि सहायता के साथ आत्मनिर्भरता भी बढ़े।
राजनीति में भी इस मुद्दे की गूंज तेज हो चुकी है। लगभग हर राजनीतिक दल महिला मतदाताओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रहा है। लेकिन यह भी जरूरी है कि ऐसी योजनाएं केवल चुनावी घोषणा बनकर न रह जाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन्हें पांच साल की चुनावी सोच से नहीं, बल्कि अगले 25 वर्षों के सामाजिक और आर्थिक विकास को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए।
सबसे बड़ा बदलाव समाज में दिखाई दे रहा है। पहले घर का बजट मुख्य रूप से पुरुष तय करते थे, लेकिन अब महिलाएं आर्थिक फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। वे सोलर पैनल लगवा रही हैं, गैस सिलेंडर भरवा रही हैं, बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला रही हैं और छोटे-छोटे उद्यम भी शुरू कर रही हैं। यह बदलाव केवल नकद सहायता से नहीं, बल्कि उस सम्मान से आया है, जो आर्थिक अधिकार मिलने के बाद महिलाओं को मिला है।
अब जरूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इन योजनाओं को और प्रभावी बनाएं। इनके लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित किया जाए, निगरानी मजबूत हो और निजी क्षेत्र तथा स्वयंसेवी संस्थाओं को भी इस अभियान से जोड़ा जाए, ताकि अंतिम गांव की अंतिम महिला तक इसका लाभ पहुंच सके। याद रखना होगा कि महिला को दिया गया एक रुपया केवल सहायता नहीं, बल्कि देश के भविष्य में किया गया निवेश है। यदि नकद सहायता, कौशल विकास और सम्मान—ये तीनों साथ आए, तो आने वाले वर्षों में भारत की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर बदल सकती है। नारी सशक्त होगी, तो राष्ट्र भी निश्चित रूप से सशक्त होगा।










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