संपादकीय
10 Jul, 2026

स्वास्थ्य नहीं, सियासत के आईसीयू में सरकारी अस्पताल: मरीज और सिस्टम, दोनों वेंटिलेटर पर

प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, जांच सुविधाओं और बुनियादी संसाधनों की कमी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

भोपाल, 10 जुलाई।

सरकार दावा करती है कि स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा सुधार हुआ है। बजट बढ़ा है, मेडिकल कॉलेज खुले हैं और आयुष्मान कार्ड बांटे गए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग तस्वीर पेश करती है। मध्यप्रदेश के कई सरकारी अस्पताल आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं। जर्जर भवन, खाली पद, खराब मशीनें और लंबी प्रतीक्षा सूची मरीजों की परेशानी बढ़ा रही हैं। इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले गरीब को अक्सर लंबी लाइन, खाली स्टूल और इलाज की जगह सिर्फ एक तारीख मिलती है।

प्रदेश के कई जिला अस्पताल आज भी पुरानी इमारतों में संचालित हो रहे हैं। बारिश में छत टपकती है, दीवारों में सीलन है और बिजली गुल होने पर व्यवस्थाएं चरमरा जाती हैं। प्रसूता वार्ड से लेकर शौचालय तक कई जगहों पर साफ-सफाई और रखरखाव की स्थिति संतोषजनक नहीं है। नई इमारतों की घोषणाएं होती हैं, लेकिन निर्माण कार्य समय पर पूरे नहीं हो पाते।

डॉक्टरों की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में बड़ी संख्या में पद खाली हैं। जिला अस्पतालों में भी एक डॉक्टर पर जरूरत से कहीं अधिक मरीजों का बोझ है। मेडिकल कॉलेजों की सीटें बढ़ी हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी बनी हुई है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा प्रदेश के कुछ सरकारी मेडिकल कॉलेजों को बुनियादी व्यवस्थाओं की कमी पर नोटिस भी दिए जा चुके हैं।

नर्सिंग स्टाफ की स्थिति भी चिंताजनक है। कई अस्पतालों में एक नर्स के जिम्मे दर्जनों मरीज हैं। डिलीवरी वार्ड, आईसीयू और रात की ड्यूटी में पर्याप्त स्टाफ का अभाव मरीजों की सुरक्षा और उपचार, दोनों को प्रभावित करता है। यह उस स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर है, जिसके बेहतर होने के दावे लगातार किए जाते हैं।

जांच सुविधाओं की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। डॉक्टर कई जांच लिखते हैं, लेकिन अस्पताल में अधिकांश जांच उपलब्ध नहीं होतीं। कहीं मशीन खराब है तो कहीं तकनीशियन नहीं है। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और एमआरआई जैसी सुविधाओं के लिए मरीजों को निजी केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है। दवाओं की स्थिति भी अलग नहीं है। सूची में मुफ्त दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन कई बार मरीजों को 'स्टॉक नहीं है' कहकर बाजार से दवा खरीदने के लिए भेज दिया जाता है।

जरूरत इस बात की है कि खाली पदों पर शीघ्र नियुक्तियां हों, जिला अस्पतालों में जांच सुविधाएं चौबीसों घंटे उपलब्ध कराई जाएं, खराब मशीनों की समयबद्ध मरम्मत हो और लापरवाही तय होने पर अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल बजट और घोषणाओं से नहीं, बल्कि अस्पताल में मरीज को मिलने वाली सुविधा से होना चाहिए।

स्वास्थ्य कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है। यदि सरकारी अस्पतालों की स्थिति में वास्तविक सुधार नहीं हुआ, तो सबसे अधिक कीमत गरीब और मध्यम वर्ग को चुकानी पड़ेगी। अस्पताल दावों से नहीं, बल्कि जवाबदेही, संसाधनों और मजबूत इच्छाशक्ति से चलते हैं। यही समय है कि सरकार दावों से आगे बढ़कर व्यवस्था को वास्तव में उपचार दे।

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