संपादकीय
11 Jul, 2026

एक राष्ट्र, एक पहचान या विविधता पर नियंत्रण?

चीन के नए जातीय एकता कानून ने राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान, मानवाधिकार और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों को लेकर वैश्विक स्तर पर नई बहस छेड़ दी है।

बीजिंग, 11 जुलाई।

चीन का नया जातीय एकता कानून राष्ट्रीय एकीकरण के नाम पर अल्पसंख्यकों की पहचान और अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

चीन एक बार फिर मानवाधिकारों और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को लेकर वैश्विक बहस के केंद्र में है। इस बार वजह है उसका नया जातीय एकता कानून, जिसे चीन राष्ट्रीय एकता और सामाजिक स्थिरता का माध्यम बता रहा है। वहीं मानवाधिकार संगठनों, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और कई पश्चिमी देशों का मानना है कि यह कानून तिब्बतियों, उइगर मुसलमानों, मंगोलों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों को कमजोर कर सकता है।

चीन की सरकार का दावा है कि यह कानून देश के सभी 56 मान्यता प्राप्त जातीय समुदायों के बीच भाईचारा, समानता और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसका असली उद्देश्य विविधता को सम्मान देना नहीं, बल्कि सभी समुदायों को बहुसंख्यक हान समुदाय की संस्कृति में ढालना है। यही कारण है कि कानून लागू होने से पहले ही यह अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय बन गया।

कानून में क्या है?

यह कानून चीन की सरकार को ऐसे किसी भी व्यक्ति, संगठन या विदेशी संस्था के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार देता है, जिस पर "जातीय विभाजन फैलाने" या "राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने" का आरोप लगाया जाए। यह अधिकार केवल चीन की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों और कार्यकर्ताओं तक भी बढ़ाया गया है।

सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य अलगाववाद और हिंसा पर रोक लगाना है, लेकिन मानवाधिकार संगठनों को आशंका है कि इसका इस्तेमाल सरकार की आलोचना करने वालों और निर्वासित कार्यकर्ताओं के खिलाफ भी किया जा सकता है।

शी जिनपिंग की नीति का अगला कदम:

राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद चीन ने राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने की नीति अपनाई है। तिब्बत, शिनजियांग और भीतरी मंगोलिया जैसे क्षेत्रों में वर्षों से भाषा, शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण लगातार बढ़ा है।

नया कानून इसी नीति का अगला चरण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसी राष्ट्रीय पहचान बनाना है जिसमें सभी समुदाय स्वयं को सबसे पहले "चीनी" मानें और अपनी स्थानीय, सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान को दूसरे स्थान पर रखें।

चीन का तर्क है कि राष्ट्रीय एकता आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता के लिए आवश्यक है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि एकरूपता थोपने से एकता नहीं, बल्कि असंतोष बढ़ता है।

भाषा से लेकर संस्कृति तक बढ़ता नियंत्रण:

कानून के तहत स्कूलों और सरकारी संस्थानों में मंदारिन भाषा को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। बच्चों में "चीनी राष्ट्र के प्रति प्रेम" और कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति निष्ठा विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया है।

पिछले कुछ वर्षों में शिनजियांग, तिब्बत और भीतरी मंगोलिया में स्थानीय भाषाओं के उपयोग को सीमित करने के कई कदम उठाए गए हैं। मंगोल भाषा की पढ़ाई में कमी के खिलाफ वर्ष 2020 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। अब आशंका जताई जा रही है कि नया कानून ऐसे कदमों को और कानूनी आधार देगा।

प्रचार अभियान भी तेज:

कानून लागू होने के साथ ही चीन ने इसके समर्थन में व्यापक प्रचार अभियान शुरू किया है। सरकारी मीडिया, सार्वजनिक कार्यक्रमों, सांस्कृतिक आयोजनों और सामाजिक माध्यमों के जरिए "जातीय एकता" का संदेश दिया जा रहा है।

कई स्थानों पर रोबोट लोगों को नए कानून की जानकारी देते दिखाई दिए। स्कूलों और स्थानीय प्रशासन ने प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और जनसभाएं आयोजित कर लोगों को इस कानून के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया। सरकार इसे राष्ट्रीय एकता का अभियान बता रही है।

दुनिया क्यों चिंतित है?

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि चीन में अल्पसंख्यकों की भाषा, धर्म, संस्कृति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगातार सीमित होती जा रही है।

मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि शिनजियांग में बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत शिविरों में रखा गया, राजनीतिक शिक्षा दी गई और धार्मिक गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण लगाया गया। तिब्बत में भी लंबे समय से धार्मिक संस्थानों और दलाई लामा से जुड़े प्रभाव को कम करने के प्रयास किए जाते रहे हैं।

नए कानून के बाद आशंका और बढ़ गई है कि स्थानीय परंपराओं, भाषाओं और सांस्कृतिक पहचान पर सरकारी नियंत्रण और मजबूत होगा।

ताइवान ने भी जताई चिंता

इस कानून का असर केवल चीन के भीतर तक सीमित नहीं माना जा रहा। ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने आशंका जताई है कि भविष्य में इस कानून का इस्तेमाल ताइवानी नागरिकों पर भी राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।

हालांकि चीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह कानून सभी जातीय समुदायों को मजबूत और एकजुट करने के लिए बनाया गया है, किसी के अधिकार छीनने के लिए नहीं।

क्या राष्ट्रीय एकता का यही रास्ता है?

हर देश अपनी एकता और संप्रभुता की रक्षा करना चाहता है। भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में अलगाववाद से निपटने के लिए कानून हैं। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विविधता साथ-साथ चलती हैं।

यदि किसी समुदाय की भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराएं और पहचान धीरे-धीरे समाप्त होने लगें, तो यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक क्षरण भी है।

यही प्रश्न चीन का नया कानून दुनिया के सामने खड़ा करता है - क्या एक मजबूत राष्ट्र बनाने के लिए सभी नागरिकों की पहचान एक जैसी होना जरूरी है, या फिर अलग-अलग पहचान के साथ भी राष्ट्रीय एकता मजबूत रह सकती है?

संतुलन ही स्थायी समाधान:

चीन आज आर्थिक और सामरिक दृष्टि से विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में शामिल है। इसलिए उसके आंतरिक फैसलों का असर केवल उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। यह कानून भी केवल एक घरेलू कानून नहीं, बल्कि यह संकेत है कि आने वाले वर्षों में चीन अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक नीतियों को किस दिशा में ले चाहता है।

राष्ट्रीय एकता किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होती है, लेकिन उसकी नींव विश्वास, सम्मान और समान अवसरों पर टिकती है। यदि एकता का आधार केवल नियंत्रण और एकरूपता बन जाए, तो वह लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रहती। इसलिए चीन का यह नया कानून केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक विविधता और मानवाधिकारों के बीच संतुलन पर छिड़ी वैश्विक बहस का नया अध्याय भी है।

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