संपादकीय
11 Jul, 2026

चार साल में 47 हजार बेटियां गायब, प्रदेश में मानव तस्करी का काला कारोबार बेनकाब

मध्यप्रदेश में चार वर्षों के दौरान 47 हजार से अधिक महिलाओं और बच्चियों के लापता होने के मामलों ने मानव तस्करी, जांच व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

भोपाल, 11 जुलाई।

मध्यप्रदेश के नक्शे पर अब सन्नाटा फैल रहा है। यह सन्नाटा किसी जंगल का नहीं, बल्कि 47 हजार से अधिक परिवारों का है। बीते चार वर्षों में प्रदेश से 47 हजार से ज्यादा महिलाएं और बच्चियां लापता हुई हैं। इनमें से अधिकांश का आज तक कोई पता नहीं चल सका है। यह आंकड़ा सामने आने के बाद हर किसी के पैरों तले जमीन खिसक गई। इसका अर्थ है कि हर दिन औसतन 32 बेटियां गायब हुईं और हर सप्ताह 220 से अधिक परिवार उजड़ गए। इस दौरान सिस्टम सुस्त बना रहा, फाइलें चलती रहीं और तस्करों का नेटवर्क फलता-फूलता रहा।

अब पुलिस मुख्यालय ने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं और इसे एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल को सौंपा गया है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार भी मान रही है कि यह सामान्य गुमशुदगी का मामला नहीं, बल्कि सुनियोजित मानव तस्करी और संगठित अपराध का गंभीर मामला हो सकता है।

47 हजार का आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है। इनमें बड़ी संख्या नाबालिग बच्चियों की है, जिनकी उम्र 14, 15 और 17 वर्ष के बीच है। जो बेटियां स्कूल जाने की उम्र में थीं, वे आज पता नहीं किस हाल में हैं। भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, सागर और रीवा सहित लगभग हर जिले से शिकायतें सामने आईं, लेकिन अनेक मामलों में एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई, जांच औपचारिकता बनकर रह गई और फाइलें बंद कर दी गईं। परिजन थानों के चक्कर काटते रहे, जबकि कई जगह पुलिस 24 घंटे पूरे होने का इंतजार करती रही।

मानव तस्करों के तौर-तरीके भी बदल चुके हैं। पहले बहला-फुसलाकर ले जाया जाता था, अब सोशल मीडिया पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर दोस्ती की जाती है, नौकरी का झांसा दिया जाता है, शादी के सपने दिखाए जाते हैं और फिर एक दिन लड़की घर से निकलती है और वापस नहीं लौटती। कुछ गिरोह रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर सक्रिय हैं, जबकि कुछ एजेंट गांव-गांव जाकर गरीब परिवारों की बेटियों को शहर में काम दिलाने के नाम पर ले जाते हैं और बाद में उन्हें दूसरे राज्यों तक पहुंचा देते हैं। कुछ मामलों में नेपाल और बांग्लादेश तक मानव तस्करी की आशंकाएं भी सामने आई हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे नेटवर्क में स्थानीय स्तर पर मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है।

अब जब मामला एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल के पास पहुंचा है तो उम्मीद जगी है कि पुराने मामलों की समीक्षा होगी, अधिक प्रभावित जिलों की रिपोर्ट मंगाई जाएगी और नेटवर्क को तोड़ने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या एक सेल के पास इतने बड़े अभियान के लिए पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित स्टाफ, आधुनिक तकनीक और दूसरे राज्यों के साथ प्रभावी समन्वय की व्यवस्था है? यदि इन सवालों का समाधान नहीं हुआ तो यह जांच भी पहले की तरह ठंडी पड़ सकती है।

मानव तस्करी के पीछे गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक उदासीनता और पुलिस की लापरवाही जैसे कई कारण हैं। कई परिवार बदनामी के डर से शिकायत दर्ज नहीं कराते। वहीं गुमशुदगी के मामलों में समय पर साइबर जांच और अंतरराज्यीय समन्वय भी अक्सर नहीं हो पाता। दूसरी ओर, मुकदमे वर्षों तक चलते हैं और कई आरोपी साक्ष्यों के अभाव में बच निकलते हैं।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए हर जिले में महिला हेल्प डेस्क चौबीसों घंटे सक्रिय होनी चाहिए। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष निगरानी बढ़ाई जाए। स्कूलों और कॉलेजों में साइबर सुरक्षा तथा आत्मरक्षा का प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए। गुमशुदा महिलाओं का एकीकृत डाटाबेस तैयार कर सभी राज्यों के साथ साझा किया जाए। मानव तस्करी के मामलों के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें बनें और दोषियों को शीघ्र एवं कठोर दंड मिले। सोशल मीडिया मंचों के साथ समन्वय बढ़ाकर फर्जी प्रोफाइल और संदिग्ध गतिविधियों पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

यह केवल 47 हजार गुमशुदा बेटियों का मामला नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की टूटी हुई उम्मीदों और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। यदि इस बार भी जांच केवल कागजों तक सीमित रही तो यह हमारी व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता होगी। अब समय भाषणों का नहीं, ठोस कार्रवाई का है। हर लापता बेटी की सुरक्षित घर वापसी ही इस पूरे तंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा है।

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