भोपाल, 23 जुलाई।
मध्यप्रदेश में प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहारा देने वाली मुख्यमंत्री मेधावी विद्यार्थी योजना आज खुद संकट में नजर आ रही है। जिस योजना को गरीब और मध्यम वर्ग के मेधावी छात्रों के लिए संजीवनी माना गया था, वही अब उनके लिए परेशानी का कारण बनती दिख रही है। वजह साफ है, सरकार ने वादा तो किया, लेकिन समय पर राशि जारी नहीं की। सत्र 2025-26 शुरू हो चुका है, जबकि पिछले वर्ष की फीस सहायता अब तक कॉलेजों तक नहीं पहुंची है। इसका असर प्रदेश के लगभग 95 हजार छात्रों पर पड़ रहा है।
इंजीनियरिंग, मेडिकल, एमबीए और लॉ जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस लाखों रुपये में है। सामान्य किसान, मजदूर या छोटे कर्मचारियों के लिए इतनी बड़ी राशि जुटाना आसान नहीं है। इसी चुनौती को दूर करने के लिए यह योजना बनाई गई थी, ताकि आर्थिक अभाव किसी मेधावी छात्र की पढ़ाई में बाधा न बने। लेकिन अब कॉलेज फीस जमा करने का दबाव बना रहे हैं और सरकारी भुगतान लंबित है। ऐसे में हजारों छात्र पढ़ाई छोड़ने या कर्ज लेने की मजबूरी का सामना कर रहे हैं।
इस स्थिति के पीछे वित्तीय योजना का अभाव, विभागों के बीच समन्वय की कमी और जवाबदेही की कमी प्रमुख कारण हैं। उच्च शिक्षा विभाग, तकनीकी शिक्षा विभाग और कॉलेज अलग-अलग दावे कर रहे हैं, लेकिन सबसे अधिक नुकसान छात्रों को उठाना पड़ रहा है। कई संस्थानों से छात्रों को कक्षाओं में बैठने से रोकने, परीक्षा फार्म नहीं भरने और प्रवेश निरस्त करने जैसी शिकायतें सामने आई हैं।
यह केवल फीस का नहीं, बल्कि सरकार की विश्वसनीयता का भी प्रश्न है। यदि समय पर सहायता नहीं मिलेगी तो योजना पर छात्रों का भरोसा कमजोर होगा और प्रतिभा पलायन बढ़ सकता है। सरकार को तत्काल लंबित राशि जारी कर सीधे कॉलेजों को भुगतान सुनिश्चित करना चाहिए तथा प्रभावी निगरानी व्यवस्था लागू करनी चाहिए। शिक्षा पर होने वाला खर्च बोझ नहीं, बल्कि भविष्य का निवेश है। यदि आज मेधावी छात्रों की पढ़ाई बाधित हुई, तो इसका असर आने वाले वर्षों में प्रदेश के विकास, रोजगार और मानव संसाधन की गुणवत्ता पर भी स्पष्ट दिखाई देगा।









