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संपादकीय
23 Jul, 2026

शहरों की जेब से चल रही भारत की अर्थव्यवस्था : 76 फीसदी खर्च और 60 फीसदी युवा बना रहे नया भारत

देश की कुल खपत में शहरी भारत और युवाओं की बढ़ती हिस्सेदारी से टियर-2 शहर, टियर-3 शहर तथा रिटेल बाजार भारतीय अर्थव्यवस्था की नई विकास धुरी बनकर उभर रहे हैं।

नई दिल्ली, 23 जुलाई।

भारत अब तेजी से बदल रहा है। देश की अर्थव्यवस्था में शहरों की भूमिका पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है और इस बदलाव की सबसे बड़ी ताकत युवा बनकर उभरे हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल खपत का 76 प्रतिशत हिस्सा शहरी भारत से आता है, जबकि इस खर्च का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा 35 वर्ष से कम आयु के युवाओं द्वारा किया जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि देश की आर्थिक गतिविधियों का केंद्र अब केवल महानगर नहीं रहे, बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहर भी तेजी से विकास की धुरी बनते जा रहे हैं।

'अर्बन भारत: इंडियाज कंजम्पशन स्टोरी' नामक रिपोर्ट में 100 से अधिक उपभोक्ता व्यवहार पैटर्न का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि पहले जहां मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे महानगरों को खपत का मुख्य केंद्र माना जाता था, वहीं अब भोपाल, इंदौर, लखनऊ, जयपुर, कोयंबटूर और नागपुर जैसे शहर भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में उपभोक्ता खर्च की वृद्धि सबसे अधिक दर्ज की गई है। यह संकेत है कि छोटे शहरों की आर्थिक क्षमता लगातार मजबूत हो रही है और उनकी उपभोक्ता शक्ति तेजी से बढ़ रही है।

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह युवा आबादी है। आज का युवा डिजिटल दुनिया के साथ बड़ा हुआ है। वह जानकारी के लिए इंटरनेट पर निर्भर है, खरीदारी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से करता है और सोशल मीडिया से प्रभावित होकर अपनी पसंद तय करता है। उसकी जरूरतें केवल भोजन, कपड़े और आवास तक सीमित नहीं हैं। वह बेहतर जीवनशैली, अनुभव, सुविधा और ब्रांडेड उत्पादों पर भी खर्च कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार रिटेल, टेलीकॉम, ज्वेलरी, शिक्षा, ई-कॉमर्स, रियल एस्टेट और पर्सनल फाइनेंस सहित अनेक क्षेत्रों में सबसे अधिक खर्च इसी आयु वर्ग के लोग कर रहे हैं। आज का बाजार युवाओं की पसंद से संचालित हो रहा है और भविष्य की दिशा भी वही तय करेंगे।

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019 में भारत का रिटेल बाजार लगभग 10.6 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था, जो 2024 तक बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गया। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारतीय रिटेल बाजार 137 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसमें ऑनलाइन रिटेल की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ रही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पारंपरिक बाजार के साथ-साथ डिजिटल बाजार भी तेजी से विस्तार कर रहा है और मोबाइल फोन अब सबसे बड़ा शॉपिंग प्लेटफॉर्म बन चुका है।

इस शहरी बदलाव के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, तेजी से बढ़ता शहरीकरण। रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में लोग गांवों से शहरों की ओर आ रहे हैं। दूसरा, बढ़ती आय। मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ है और उसकी क्रय शक्ति पहले से अधिक मजबूत हुई है। तीसरा, तकनीक का विस्तार। सस्ते इंटरनेट और स्मार्टफोन ने देश के हर हिस्से को बाजार से जोड़ दिया है। आज छोटे शहर का युवा भी वही उत्पाद खरीदना चाहता है जो महानगरों में लोकप्रिय हैं। यही कारण है कि बड़ी कंपनियां अब छोटे शहरों में अपने कारोबार का विस्तार कर रही हैं और स्थानीय भाषा तथा स्थानीय बाजार की जरूरतों के अनुसार अपनी रणनीति बना रही हैं।

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि अब उपभोग केवल जरूरत तक सीमित नहीं रहा। पहले लोग आय का बड़ा हिस्सा बचत में लगाते थे, लेकिन अब खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यात्रा, फिटनेस, ऑनलाइन शिक्षा, ब्रांडेड कपड़े, गैजेट्स और मनोरंजन जैसी श्रेणियों पर युवाओं का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इससे प्रीमियम और लक्जरी उत्पादों की मांग में भी तेजी आई है।

हालांकि इस बढ़ती खपत के साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने हैं। पहली चुनौती आर्थिक असमानता की है। शहर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी है। यदि यह अंतर बढ़ता गया तो विकास का संतुलन बिगड़ सकता है। दूसरी चुनौती बढ़ते उपभोक्ता कर्ज की है। आसान ईएमआई और क्रेडिट कार्ड के कारण युवा अधिक खर्च कर रहे हैं। यदि आय और खर्च के बीच संतुलन नहीं रहा, तो भविष्य में वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। तीसरी चुनौती पर्यावरण की है। बढ़ती खपत के साथ कचरा, ई-वेस्ट और प्रदूषण भी बढ़ रहा है, इसलिए टिकाऊ उपभोग की संस्कृति विकसित करना समय की आवश्यकता है।

सरकार और उद्योग जगत, दोनों के लिए यह रिपोर्ट एक स्पष्ट संकेत है। कंपनियों को अब केवल महानगरों पर निर्भर रहने के बजाय छोटे शहरों की जरूरतों और संभावनाओं को समझना होगा। वहीं सरकार को इन शहरों में आधारभूत ढांचे, कौशल विकास और डिजिटल कनेक्टिविटी पर निवेश बढ़ाना होगा, ताकि आर्थिक विकास की यह गति लंबे समय तक बनी रहे।

वर्ष 2030 तक भारत के दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इस लक्ष्य को हासिल करने में सबसे बड़ी भूमिका टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा देश की युवा आबादी की होगी। देश की कुल खपत का 76 प्रतिशत शहरों से और उसका 60 प्रतिशत युवाओं से आना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलते भारत की नई आर्थिक तस्वीर है, जो भविष्य की दिशा भी तय करेगी।

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