भोपाल, 23 जुलाई।
प्रदेश में प्रशासनिक मनमानी की एक नई मिसाल सामने आई है, जहां राज्य सरकार के स्पष्ट आदेशों के बावजूद नगर निगम ने करोड़ों रुपये अनुदान के रूप में बांट दिए। जुलाई 2021 में शासन ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि किसी भी संस्था को अनुदान देने का अधिकार अब केवल राज्य सरकार के पास होगा। इसके बावजूद भोपाल नगर निगम ने सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थाओं के नाम पर करोड़ों रुपये वितरित कर दिए। यह केवल लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिए गए फैसलों का गंभीर उदाहरण है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2021 के बाद से भोपाल नगर निगम ने विभिन्न संस्थाओं को करोड़ों रुपये अनुदान के रूप में दिए। वर्ष 2023-24 में 88.69 लाख रुपये, 2024-25 में 1.61 करोड़ रुपये, 2025-26 में 3.37 करोड़ रुपये वितरित किए गए, जबकि 2026-27 के बजट में 4.78 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। चार वर्षों में यह राशि 10.67 करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जबकि शासन के निर्देशों के अनुसार नगर निगम के पास इस मद में अनुदान देने का अधिकार ही नहीं था। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि प्रतिबंध के बावजूद फाइलें कैसे चलीं, किसने स्वीकृति दी और भुगतान किस आधार पर हुआ।
नगर निगम की ओर से यह तर्क दिया गया कि सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों को जारी रखने के लिए यह निर्णय लिया गया। दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जनभावनाओं को देखते हुए सहायता देना आवश्यक था। लेकिन जनभावना के नाम पर कानून की अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि शासन ने स्पष्ट रूप से अधिकार वापस ले लिया था, तो फिर नगर निगम ने किस नियम के तहत करोड़ों रुपये का वितरण किया, इसका उत्तर अब तक सामने नहीं आया है।
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर पहलू जवाबदेही का अभाव है। जिन संस्थाओं को अनुदान दिया गया, उनमें से अनेक के संबंध में गतिविधियों और कार्यों का समुचित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं बताया जा रहा। कई मामलों में उपयोगिता प्रमाण-पत्र और खर्च का सत्यापन भी नहीं हुआ। शासन की गाइडलाइन के अनुसार कार्य पूर्ण होने के बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत राशि जारी की जानी चाहिए थी, लेकिन कई मामलों में पूरी राशि पहले ही जारी कर दी गई। इससे वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।
यह मामला केवल भोपाल तक सीमित नहीं बताया जा रहा। जबलपुर, ग्वालियर, इंदौर और सागर जैसे अन्य नगर निगमों से भी इसी प्रकार की शिकायतें सामने आई हैं। भले ही वहां राशि कम रही हो, लेकिन यदि प्रक्रिया एक जैसी अपनाई गई है तो इसकी व्यापक जांच आवश्यक है। यदि अधिकार न होने के बावजूद अनुदान दिए गए हैं, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
इस तरह की अनियमितताओं का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है। जिन संसाधनों का उपयोग सड़क, पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं पर होना चाहिए था, वे दूसरी मदों में खर्च हो गए। जब मीडिया में यह मामला सामने आया और राज्य सरकार ने सख्ती दिखाई, तब कुछ भुगतान रोके गए और फाइलों की समीक्षा शुरू हुई। हालांकि तब तक करोड़ों रुपये वितरित किए जा चुके थे।
इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। आयुक्त, वित्त अधिकारी और लेखा शाखा से लेकर संबंधित अधिकारियों तक सभी स्तरों पर यह देखा जाना आवश्यक है कि यदि शासन का स्पष्ट आदेश मौजूद था तो भुगतान की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई। वहीं जनप्रतिनिधि और अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आ रहे हैं, जबकि सबसे बड़ा नुकसान सरकारी खजाने और जनता के विश्वास को हुआ है।
राज्य सरकार ने मामले की जांच के निर्देश दिए हैं, लेकिन केवल जांच पर्याप्त नहीं होगी। यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पक्षों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। साथ ही यदि किसी स्तर पर वित्तीय अनियमितता सिद्ध होती है तो उसकी वसूली और आवश्यक कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए। भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अनुदान वितरण की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि जनता भी देख सके कि किस संस्था को कितनी राशि और किस उद्देश्य से दी गई है।
लोकतंत्र में सरकारी धन जनता की अमानत होता है। उसका उपयोग नियमों और पारदर्शिता के साथ होना चाहिए, न कि अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिए गए निर्णयों के आधार पर। यदि नियम आम नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं, तो सार्वजनिक धन के उपयोग में भी वही जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। तभी सुशासन और वित्तीय अनुशासन की अवधारणा सार्थक होगी और जनता का विश्वास कायम रह सकेगा।










