नई दिल्ली, 23 जुलाई।
लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन जब विरोध मुद्दे से अधिक प्रदर्शन बन जाए तो न लोकतंत्र मजबूत होता है और न ही जनता का हित सधता है। आज राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि समस्या से ज्यादा उसका मंचन दिखाई देता है। नीट और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का रूप लेता दिख रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में मूल मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है।
जंतर-मंतर पर कई दिनों तक परीक्षा प्रणाली में सुधार, पेपर लीक रोकने और शिक्षा माफिया पर कार्रवाई की मांग को लेकर आंदोलन चलता रहा। इस आंदोलन को सोनम वांगचुक के अनशन से राष्ट्रीय पहचान मिली और कई राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दिया। सरकार ने शुरुआत में दूरी बनाई, लेकिन बाद में बातचीत के संकेत दिए और संसद में इस विषय पर चर्चा की संभावना भी बनी। इससे उम्मीद जगी कि छात्रों की चिंताओं पर गंभीर विचार होगा।
इसी बीच विपक्ष ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना शुरू कर दिया। सरकार की ओर से चर्चा के लिए सहमति जताए जाने के बावजूद प्रदर्शन जारी रहा। इसके बाद राजनीतिक बयान, पुलिस कार्रवाई और उससे जुड़े दृश्य मीडिया की सुर्खियां बन गए। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा की पारदर्शिता और लाखों छात्रों के भविष्य जैसे मूल प्रश्न पीछे छूट गए, जबकि राजनीतिक घटनाक्रम चर्चा का केंद्र बन गया।
यदि उद्देश्य वास्तव में शिक्षा सुधार है, तो उसके लिए ठोस मॉडल और व्यवहारिक सुझाव भी सामने आने चाहिए। जिन राज्यों में संबंधित दलों की सरकारें हैं, वहां पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, समयबद्ध भर्ती और जवाबदेह व्यवस्था का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। केवल विरोध से व्यवस्था नहीं बदलती, उसके लिए नीतिगत सुधार और प्रशासनिक इच्छाशक्ति भी जरूरी होती है।
नीट परीक्षा को लेकर छात्रों की नाराजगी स्वाभाविक है। पेपर लीक जैसी घटनाओं ने लाखों विद्यार्थियों का भरोसा कमजोर किया है। दोबारा परीक्षा और प्रवेश प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है, लेकिन परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की जरूरत अब भी बनी हुई है। परीक्षा एजेंसियों को तकनीकी रूप से मजबूत करना, डेटा सुरक्षा बढ़ाना, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता सुनिश्चित करना और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई करना समय की मांग है।
विपक्ष की भूमिका केवल विरोध तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे रचनात्मक सुझाव देने और समाधान प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। दूसरी ओर सरकार को भी यह समझना होगा कि युवाओं की चिंताओं को केवल राजनीतिक विवाद मानकर टाला नहीं जा सकता। शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर संवाद, विशेषज्ञों की सलाह और संस्थागत सुधार ही स्थायी समाधान दे सकते हैं।
आंदोलन लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति हैं, लेकिन उनका उद्देश्य समस्या का समाधान होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक संदेश देना। नीट का मुद्दा लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा है। इसे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनाने के बजाय शिक्षा व्यवस्था को अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने पर ध्यान देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। लोकतंत्र की असली जीत कैमरों के सामने होने वाले प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उन फैसलों में है जो छात्रों का भविष्य सुरक्षित करें। तभी राजनीति अपनी जिम्मेदारी निभाएगी और लोकतंत्र का उद्देश्य भी सार्थक होगा।









