नई दिल्ली, 25 जुलाई।
देश में आयुष शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। अब आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी कॉलेजों में घोस्ट फैकल्टी और फर्जी दस्तावेजों के दिन खत्म होने वाले हैं। राष्ट्रीय आयुष आयोग ने सभी आयुष कॉलेजों के लिए नए और सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका पालन नहीं करने पर कॉलेजों की मान्यता रद्द की जा सकती है और सीटों में 20 प्रतिशत तक की कटौती भी हो सकती है। यह कदम आयुष शिक्षा की साख बचाने और छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से उठाया गया है, क्योंकि पिछले कई वर्षों से फर्जी फैकल्टी और केवल कागजों पर संचालित कॉलेजों की शिकायतें लगातार मिल रही थीं।
नए नियमों के अनुसार अब किसी भी आयुष कॉलेज को मान्यता तभी मिलेगी, जब वह सभी निर्धारित मानकों पर खरा उतरेगा। सबसे बड़ा बदलाव बायोमेट्रिक उपस्थिति को लेकर किया गया है। अब प्रत्येक कॉलेज में शिक्षकों और कर्मचारियों की उपस्थिति बायोमेट्रिक प्रणाली से दर्ज होगी। यदि कोई कॉलेज बायोमेट्रिक व्यवस्था नहीं अपनाता या उसमें गड़बड़ी पाई जाती है तो उसे मान्यता नहीं मिलेगी। इसका सीधा अर्थ है कि अब केवल कागजों पर शिक्षक दिखाकर कॉलेज नहीं चलाए जा सकेंगे। आयोग का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में कई कॉलेज ऐसे पाए गए, जहां रिकॉर्ड में 20 से 25 शिक्षक दर्ज थे, लेकिन वास्तव में केवल चार या पांच शिक्षक ही पढ़ाते थे। बाकी सभी घोस्ट फैकल्टी थे, जो कभी कॉलेज आते ही नहीं थे।
नए प्रावधान कॉलेज और फैकल्टी से जुड़ी कमियों को भी स्पष्ट करते हैं। यदि किसी कॉलेज में शिक्षकों की संख्या निर्धारित मानक से कम पाई जाती है तो उसे पांच प्रतिशत सीटों की कटौती का सामना करना पड़ेगा। कमी अधिक होने पर यह कटौती 20 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, यदि किसी विभाग में एक भी शिक्षक कम पाया गया तो उस विभाग में प्रवेश पर रोक लगाई जा सकती है। पहले कॉलेज एक-दो शिक्षक कम होने के बावजूद प्रवेश ले लेते थे और बाद में व्यवस्था करने का प्रयास करते थे, लेकिन अब ऐसा संभव नहीं होगा। आयोग हर वर्ष भौतिक और डिजिटल, दोनों स्तरों पर निरीक्षण करेगा।
नए नियमों का एक महत्वपूर्ण पहलू फीस और अधोसंरचना से भी जुड़ा है। कॉलेजों में प्रयोगशाला, पुस्तकालय, अस्पताल और छात्रावास जैसी बुनियादी सुविधाएं निर्धारित मानकों के अनुरूप होना अनिवार्य होगा। यदि किसी कॉलेज में ये सुविधाएं नहीं मिलीं तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा और बार-बार नियमों का उल्लंघन करने पर मान्यता भी रद्द की जा सकती है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब कॉलेज मनमानी फीस नहीं वसूल सकेंगे। फीस का पूरा ढांचा पारदर्शी होगा और उसे कॉलेज की वेबसाइट पर सार्वजनिक करना होगा, ताकि छात्रों और अभिभावकों के साथ किसी प्रकार की धोखाधड़ी न हो।
सबसे सख्त प्रावधान शिक्षकों की योग्यता और अनुभव को लेकर किए गए हैं। अब केवल वही शिक्षक नियुक्त किए जा सकेंगे, जिनके पास राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग (एनसीआईएसएम) के निर्धारित मानकों के अनुरूप डिग्री और अनुभव होगा। फर्जी डिग्री या अनुभव प्रमाण-पत्र के आधार पर नियुक्ति करने वाले कॉलेजों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाएगी। आयोग का मानना है कि आयुष चिकित्सा से जुड़े छात्रों के भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यदि एक अयोग्य डॉक्टर तैयार होता है तो उसका सीधा असर मरीजों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसलिए गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
इन नए निर्देशों के बाद देशभर के आयुष कॉलेजों में हलचल है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सबसे अधिक आयुष कॉलेज हैं और कई संस्थानों की पहले से जांच चल रही है। भोपाल के कुछ आयुष कॉलेजों की शिकायतें भी आयोग तक पहुंची थीं। कॉलेज संचालकों का कहना है कि अचानक इतनी सख्ती से उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि योग्य शिक्षक मिलना आसान नहीं है और अधोसंरचना विकसित करने में समय और धन दोनों लगते हैं। वहीं छात्रों और अभिभावकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि वर्षों से वे भारी फीस देकर ऐसे कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे थे, जहां शिक्षा के नाम पर केवल औपचारिकताएं पूरी की जाती थीं।
आयुष चिकित्सा भारत की प्राचीन विरासत है और आज पूरी दुनिया में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। कोविड महामारी के बाद आयुर्वेद और योग के प्रति लोगों का विश्वास और अधिक मजबूत हुआ है। ऐसे समय में यदि देश के आयुष डॉक्टरों की गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे तो पूरी चिकित्सा पद्धति की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। इसलिए सरकार का यह कदम न केवल आयुष शिक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर उसकी प्रतिष्ठा भी बढ़ाएगा। आयोग ने कॉलेजों को निर्देश दिया है कि नए सत्र से पहले सभी जानकारियां पोर्टल पर अपडेट करें और सेल्फ असेसमेंट रिपोर्ट जमा करें। यदि निरीक्षण में कोई कमी मिलती है तो पहले सुधार का अवसर दिया जाएगा, लेकिन उसके बाद भी लापरवाही मिलने पर मान्यता रद्द करने, सीटें घटाने और जुर्माना लगाने जैसी सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि अब आयुष शिक्षा में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा और शिक्षा के नाम पर कारोबार करने वालों के लिए जगह लगातार सिमटती जाएगी।














