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संपादकीय
27 Jul, 2026

52 करोड़ भारतीयों की थाली से दूर हुआ पोषण, 358 रुपये रोज का खर्च आम आदमी के बस से बाहर

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 52 करोड़ लोग स्वस्थ आहार खरीदने में असमर्थ हैं और पौष्टिक भोजन का रोजाना का बढ़ता खर्च आम आदमी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

नई दिल्ली, 27 जुलाई।

देश में भूख और कुपोषण के आंकड़े पिछले दो दशकों में कम हुए हैं। सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने करोड़ों लोगों को दो वक्त का भोजन उपलब्ध कराने में मदद की है, लेकिन अब एक नई और गंभीर चुनौती सामने खड़ी है। यह चुनौती है पौष्टिक और संतुलित आहार की। संयुक्त राष्ट्र की स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2026 रिपोर्ट ने यह सच्चाई उजागर की है कि भारत में करीब 52 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो नियमित रूप से स्वस्थ और संतुलित भोजन खरीदने में सक्षम नहीं हैं। यानी देश की एक-तिहाई से अधिक आबादी आज भी फल, सब्जियां, दाल, दूध और प्रोटीनयुक्त भोजन जैसी बुनियादी पोषण जरूरतों को हर दिन पूरा नहीं कर पा रही है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत में स्वस्थ आहार की औसत लागत बढ़कर 358 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पहुंच गई है। यह आंकड़ा क्रय शक्ति समता के आधार पर निकाला गया है। 2024 की तुलना में यह लागत 343 रुपये से बढ़कर 358 रुपये हो गई है। यानी एक वर्ष में ही खर्च 15 रुपये बढ़ गया। महंगाई के इस दौर में, जब दाल, तेल, सब्जी और दूध की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, तब 358 रुपये प्रतिदिन का खर्च एक आम परिवार के लिए बड़ा बोझ बन गया है। पांच सदस्यीय परिवार के लिए इसका अर्थ लगभग 1,790 रुपये प्रतिदिन और करीब 53,700 रुपये प्रतिमाह केवल भोजन पर खर्च करना है, जो अधिकांश निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए संभव नहीं है।

रिपोर्ट की सबसे चिंताजनक बात यह है कि भूख कम होने के बावजूद पोषण की समस्या बनी हुई है। वर्ष 2019 से 2025 के बीच स्वस्थ आहार खरीदने में असमर्थ लोगों की संख्या में लगभग 29 प्रतिशत की कमी आई है। यह सकारात्मक संकेत है, लेकिन फिर भी 52 करोड़ का आंकड़ा बताता है कि देश खाद्य सुरक्षा के मामले में आगे बढ़ा है, जबकि पोषण सुरक्षा अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। लोग पेट भरने के लिए सस्ता अनाज और कार्बोहाइड्रेटयुक्त भोजन तो ले पा रहे हैं, लेकिन शरीर को आवश्यक विटामिन, खनिज और प्रोटीन नहीं मिल पा रहे हैं।

इसका सीधा असर बच्चों और महिलाओं पर पड़ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2024 में पांच वर्ष से कम आयु के 32.9 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन से प्रभावित थे। यानी कुपोषण के कारण उनकी लंबाई उम्र के अनुसार नहीं बढ़ पा रही है। दूसरी ओर बच्चों और वयस्कों में मोटापे की दर भी लगातार बढ़ रही है। यह विरोधाभास इसलिए है क्योंकि लोग सस्ते और अधिक कैलोरी वाले, लेकिन पोषक तत्वों से रहित भोजन की ओर बढ़ रहे हैं। पैकेटबंद स्नैक्स, तले हुए खाद्य पदार्थ और चीनी युक्त पेय आसानी से उपलब्ध हैं और अपेक्षाकृत सस्ते भी हैं। परिणामस्वरूप शरीर को कैलोरी तो मिल रही है, लेकिन पर्याप्त पोषण नहीं।

विश्व स्तर पर तुलना करें तो भारत में स्वस्थ आहार की लागत पाकिस्तान के बराबर 343 रुपये और बांग्लादेश से कम 399 रुपये बताई गई है, जबकि चीन में यह 317 रुपये और अमेरिका में 249 रुपये है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अमेरिका से महंगा है, बल्कि क्रय शक्ति के हिसाब से भारतीयों के लिए 358 रुपये प्रतिदिन खर्च करना कहीं अधिक कठिन है। इसका प्रमुख कारण खाद्य महंगाई, आय में असमानता और पोषण संबंधी जागरूकता की कमी है। पिछले कुछ वर्षों में सब्जी, फल, दाल और दूध की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। मानसून की अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन और आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं ने भी स्थिति को प्रभावित किया है।

इस समस्या का समाधान केवल राशन बांटने से नहीं होगा। सरकार को अब खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर पोषण सुरक्षा पर ध्यान देना होगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गेहूं और चावल के साथ दाल, खाद्य तेल और मोटे अनाज को भी शामिल करना चाहिए। आंगनबाड़ी और मध्याह्न भोजन योजना को और मजबूत बनाना होगा, ताकि बच्चों को पौष्टिक भोजन मिल सके। महिलाओं को पोषण संबंधी शिक्षा देकर कम बजट में संतुलित भोजन तैयार करने के लिए प्रेरित करना होगा। साथ ही स्थानीय स्तर पर फल, सब्जी और मोटे अनाज के उत्पादन को बढ़ावा देना होगा, ताकि उनकी उपलब्धता बढ़े और कीमतें नियंत्रित रहें।

किसानों की भूमिका भी इसमें महत्वपूर्ण है। यदि मोटे अनाज, दाल और तिलहन की सरकारी खरीद तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य को प्रभावी बनाया जाए तो किसान पोषक फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित होंगे। इससे बाजार में पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ेगी और उनकी कीमतें भी संतुलित रहेंगी। वहीं, शहरों में किफायती और पौष्टिक भोजन के विकल्प बढ़ाने की जरूरत है। मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से भी स्वस्थ खानपान के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी।

भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यदि 52 करोड़ लोगों की थाली से पोषण दूर रहेगा तो यह विकास अधूरा रहेगा। अब समय केवल भूख मिटाने का नहीं, बल्कि कुपोषण मिटाने का है। स्वस्थ भारत का सपना तभी साकार होगा, जब हर भारतीय की थाली में दाल, रोटी, सब्जी, फल और दूध जैसी पौष्टिक चीजें ऐसी कीमत पर उपलब्ध हों, जो हर परिवार की पहुंच में हों। एक स्वस्थ नागरिक ही मजबूत राष्ट्र की सबसे बड़ी नींव होता है।

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