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संपादकीय
29 Jul, 2026

गुरु पूर्णिमा: जीवन का अंधकार मिटाकर आत्मज्ञान की राह दिखाने वाला पावन पर्व

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का ऐसा पावन पर्व है, जो गुरु के सम्मान के साथ ज्ञान, आत्मविकास, सही मार्गदर्शन और जीवन मूल्यों के महत्व का संदेश देता है।

भारत, 29 जुलाई।

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पावन पर्व है, जो केवल गुरु का सम्मान करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह जीवन में ज्ञान, विवेक और आत्मिक जागृति के महत्व को समझने का भी दिन है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल अपने जन्म, परिस्थितियों या सीमाओं तक बंधा हुआ नहीं है। यदि सही मार्गदर्शन मिले और प्रयास करने की इच्छा हो, तो जीवन में आगे बढ़ने और स्वयं को बदलने के सभी द्वार खुले रहते हैं।

भारतीय परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। इसका कारण यह है कि गुरु ही वह व्यक्ति होता है जो अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश देता है। गुरु केवल पढ़ाई-लिखाई नहीं सिखाते, बल्कि जीवन जीने की कला, सही निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास भी विकसित करते हैं। इसलिए कहा गया है कि गुरु जीवन को नई दिशा देने वाले दीपक के समान हैं।

गुरु शब्द का अर्थ ही है - जो अंधकार को दूर करे। जीवन में यह भूमिका केवल किसी आध्यात्मिक संत या शिक्षक तक सीमित नहीं होती। हमारे माता-पिता, जिन्होंने हमें जीवन के पहले संस्कार दिए, हमारे शिक्षक जिन्होंने शिक्षा दी, कठिन समय में सही सलाह देने वाले मित्र, कोई प्रेरणादायक पुस्तक या जीवन के अनुभव भी हमारे गुरु बन सकते हैं। हर वह व्यक्ति या अनुभव जो हमें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है, वास्तव में गुरु का ही स्वरूप है।

गुरु पूर्णिमा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि मनुष्य एक स्थिर और अपरिवर्तनीय जीवन नहीं है। यदि वह सीखने और स्वयं को बदलने का संकल्प ले, तो उसका व्यक्तित्व पूरी तरह बदल सकता है। यह पर्व हमें विश्वास दिलाता है कि परिवर्तन संभव है, विकास संभव है और आत्मज्ञान भी संभव है। यही कारण है कि यह दिन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर माना जाता है।

पूर्णिमा का चंद्रमा भी इस पर्व का महत्वपूर्ण प्रतीक है। जिस प्रकार पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपने पूर्ण प्रकाश से अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार एक सच्चा गुरु हमारे मन में बसे भ्रम, अज्ञान और भय को दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। गुरु हमें यह समझाते हैं कि जीवन की कठिनाइयों से भागने के बजाय उनका सामना कैसे किया जाए और हर परिस्थिति से सीख लेकर आगे कैसे बढ़ा जाए।

भारत की सबसे प्राचीन और गौरवशाली परंपराओं में से एक है गुरु-शिष्य परंपरा। यह केवल पढ़ाई या जानकारी देने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि जीवन मूल्यों, चरित्र, अनुशासन और आध्यात्मिक ज्ञान का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण था। गुरुकुलों में विद्यार्थी वर्षों तक गुरु के साथ रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। वहां पुस्तकों से अधिक महत्व व्यवहार, अनुशासन, सेवा और अनुभव को दिया जाता था। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान परंपरा हजारों वर्षों तक जीवित रही।

गुरु-शिष्य परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गुरु केवल जानकारी नहीं देते, बल्कि शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। शिक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि गुरु के आचरण, व्यवहार और जीवन से भी मिलती है। गुरु और शिष्य का संबंध विश्वास, श्रद्धा, समर्पण और परस्पर सम्मान पर आधारित होता है। शिष्य गुरु की सेवा किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि कृतज्ञता और प्रेम से करता है। परंपरा यह भी मानती है कि सच्चा गुरु ही तय करता है कि किसे अपना शिष्य स्वीकार करना है। केवल इच्छा प्रकट कर देने से कोई व्यक्ति शिष्य नहीं बन जाता, बल्कि उसके भीतर सीखने की पात्रता और समर्पण होना आवश्यक है।

गुरु पूर्णिमा पर महर्षि वेदव्यास का भी विशेष स्मरण किया जाता है। उन्हें वेदों का संकलन करने, महाभारत की रचना और अनेक पुराणों की रचना का श्रेय दिया जाता है। इसी कारण इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित रूप देने में उनका योगदान अतुलनीय माना जाता है।

इस दिन देशभर में लोग अपने गुरु, शिक्षकों और मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और आश्रमों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों का आशीर्वाद लेते हैं, जबकि अनेक लोग ध्यान, सत्संग, दान और सेवा के कार्यों में भाग लेते हैं। यह पर्व हमें केवल गुरु को प्रणाम करना नहीं सिखाता, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है।

भारतीय संस्कृति में गुरु की महिमा को प्रसिद्ध मंत्र में व्यक्त किया गया है -

"गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः। गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।।"

अर्थात गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश हैं और गुरु ही परमब्रह्म के समान हैं। ऐसे गुरु को बार-बार प्रणाम है।

आज के डिजिटल युग में जानकारी प्राप्त करना पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है, लेकिन सही दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक आज भी उतना ही आवश्यक है। इंटरनेट हमें सूचना दे सकता है, लेकिन विवेक, चरित्र और जीवन का उद्देश्य नहीं सिखा सकता। इसलिए गुरु पूर्णिमा का महत्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था।

गुरु पूर्णिमा हमें यह संदेश देती है कि जीवन में सफलता केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन, विनम्रता, निरंतर सीखने की इच्छा और कृतज्ञता से मिलती है। जब तक मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी रूप में गुरु का सम्मान करता रहेगा, तब तक उसके भीतर ज्ञान का प्रकाश और आगे बढ़ने की प्रेरणा बनी रहेगी। यही इस पावन पर्व का सबसे बड़ा संदेश है।

-पूजा जोशी

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