इलाहाबाद, 29 जुलाई।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक एकल पीठ ने पवन कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि केवल अदालत के कहने भर से किसी लोकसेवक के विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति प्रदान नहीं की जा सकती है। न्यायमूर्ति राजवीर सिंह ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से सरकार अथवा सक्षम प्राधिकारी का विशेषाधिकार है और कोई भी न्यायालय इस दिशा में अधिकारियों पर दबाव नहीं बना सकता है।
इसी महत्वपूर्ण विधिक आधार को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने एक पूर्व जिलाधिकारी के विरुद्ध केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए मुकदमों की पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया है।
अदालत की पीठ का यह कहना था कि अभियोजन की स्वीकृति देने से पहले सक्षम प्राधिकारी को अपने विवेक से स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों और कानून के पहलुओं की जांच करनी होती है। यदि ऐसी मंजूरी केवल न्यायालय के किसी आदेश के दबाव में मजबूरी वश दी जाती है, तो वह विधिक रूप से मान्य नहीं ठहराई जा सकती है।
इन तमाम कानूनी सिद्धातों का हवाला देते हुए पीठ ने यह महसूस किया कि उक्त पूर्व डीएम के खिलाफ आगे कानूनी कदम उठाना उचित नहीं होगा, जिसके परिणामस्वरूप सीबीआई के इस प्रकरण को पूर्णतः खारिज कर दिया गया है।
















