नई दिल्ली, 29 जुलाई।
उच्चतम न्यायालय की एक पीठ ने भ्रष्टाचार के मामले में घिरे लोकसेवक के प्रकरण पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया है कि अभियोजन की मंजूरी देने की चार महिने की वैधानिक सीमा अनिवार्य अवश्य है, परंतु इस अवधि का पालन न होने मात्र से कोई आपराधिक कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं हो जाती है, हालांकि इस दौरान आरोपी व्यक्ति जमानत का पात्र अवश्य बन सकता है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागु की खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच या मंजूरी में होने वाली देरी के आधार पर किसी भी आरोपी को आरोपमुक्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि भ्रष्टाचार से जुड़े मुकदमों के साथ व्यापक जनहित जुड़ा होता है।
न्यायालय का यह भी कहना था कि विलंब के नाम पर कानून के दंड से मुक्ति पाने की संस्कृति कतई नहीं पनपने दी जा सकती है। अभियोजन प्रक्रिया में होने वाली देरी को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती जरूर दी जा सकती है, किंतु यह किसी भी स्थिति में मामला या आरोप रद्द किए जाने का आधार नहीं बन सकता है।
यदि किसी लोकसेवक का कृत्य उसके शासकीय कर्तव्यों के साथ प्रत्यक्ष रूप से उचित संबंध रखता है, ऐसी दशा में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 अथवा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218 के अंतर्गत सरकार की पूर्व स्वीकृति लेना लाजिमी हो जाता है, ताकि कर्मचारियों को किसी भी प्रकार के तुच्छ मुकदमों से संरक्षण प्रदान किया जा सके।
यदि एक बार अभियोजन की मंजूरी समान साक्ष्यों व सामग्री के आधार पर खारिज की जा चुकी है, तब तक बिना किसी नए प्रमाण के उसे दोबारा नहीं दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त स्वीकृति आदेश में यदि साधारण संपादनों से उसके मूल सार पर कोई असर नहीं पड़ता है, तो वह मंजूरी किसी भी हाल में अवैध नहीं ठहराई जाएगी।
इस संपूर्ण प्रकरण के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं— अभियोजन की स्वीकृति में विलंब होने से प्रकरण का अंत नहीं हो जाता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत कानून बिना किसी ठोस कारण के लंबी हिरासत की इजाजत नहीं देता है। उत्तरदायित्व तय करते हुए कार्रवाई उस अधिकारी पर होगी जो मंजूरी देने में लापरवाही या देरी करेगा।
















