नारायणपुर, 29 जुलाई।
अबूझमाड़ के सुदूर वनांचल में पारंपरिक खेती और वनोपजों को अब एक बड़ी वैश्विक पहचान मिलने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। जिले के तीन खास उत्पादों को जीआई टैग दिलाने की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
इन उत्पादों में पीला कोसरा, काला कोसरा और तीखुर शामिल हैं, जिन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट कराने का यह अपने आप में पहला ऐतिहासिक मौका है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने यहां के जनजातीय लोगों की सेहत और खान-पान का गहरा अध्ययन किया है। इस शोध में सामने आया कि आदिवासियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता का मुख्य राज उनके ये पारंपरिक मिलेट्स हैं।
प्रमुख विज्ञानी डॉ. दीपक शर्मा के अनुसार इन तीनों ही उत्पादों में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स पाया जाता है, जो मधुमेह के मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद है। इन दिनों इनकी प्रयोगशाला में अन्य गुणों की जांच चल रही है।
नारायणपुर में कलेक्टर नम्रता जैन के मार्गदर्शन में यह विशेष पहल आगे बढ़ रही है। कुछ समय पहले कृषि विश्वविद्यालय की टीम ने ओरछा विकासखंड के विभिन्न गांवों का स्थलीय दौरा किया था। दौरे के दौरान टीम ने कच्चापाल और कुतुल गांवों में जाकर इन उत्पादों के जैविक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलुओं का बारीकी से दस्तावेजीकरण किया।
किसानों और ग्रामीणों से बातचीत कर सदियों से चली आ रही खेती की पद्धतियों तथा पारंपरिक ज्ञान का संकलन भी किया गया ताकि पूरी जानकारी जुटाई जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से स्थानीय किसानों की आजीविका मजबूत होगी और इन दुर्लभ जैविक फसलों का संरक्षण भी बेहतर तरीके से हो पाएगा।
पारंपरिक लघु धान्य पीला कोसरा का पीला दाना औषधीय गुणों से भरपूर है। वहीं गहरा छिलका वाला काला कोसरा कुटकी की प्रजाति है जो आदिवासियों का मुख्य आहार है। इसके अलावा हल्दी परिवार का प्राकृतिक कंद तीखुर अपने सफेद स्टार्च पाउडर के कारण व्रत और गर्मियों में शरीर को ठंडक देने के लिए उपयोग किया जाता है। कृषि विश्वविद्यालय के प्रमुख विज्ञानी ने बताया कि लैब टेस्ट के शुरुआती संकेत बहुत अच्छे हैं और उद्देश्य इन किस्मों की शुद्धता बचाते हुए किसानों को आर्थिक लाभ दिलाना है।
















