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संपादकीय
31 Jul, 2026

मोहम्मद रफ़ी की पुण्यतिथि: सुरों के जादूगर को आज भी याद करता है संगीत जगत

मोहम्मद रफ़ी की 46वीं पुण्यतिथि पर उनके अमर गीतों, उपलब्धियों और संगीत जगत में दिए गए योगदान को याद किया जा रहा है।

मुंबई, 31 जुलाई।

ना फ़नकार तुझ-सा तेरे बाद आया,

मोहम्मद रफ़ी, तू बहुत याद आया।

मोहम्मद रफ़ी को हमसे जुदा हुए 46 वर्ष हो चुके हैं, परंतु उनके सदाबहार गीत, ग़ज़लें, भक्ति गीत और क़व्वालियाँ यही एहसास कराती हैं कि वे आज भी कहीं आसपास हैं।

उनका गाया फिल्म आसपास का गीत, जिसे आनंद बख्शी ने लिखा और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीतबद्ध किया, आज भी उन्हें जीवंत कर देता है। गीत है—

तेरे आने की आस है दोस्त,

शाम फिर क्यों उदास है दोस्त।

महकी-महकी फ़िज़ा कहती है,

तू कहीं आसपास है दोस्त।

सुबह-सुबह आप रेडियो पर मोहम्मद रफ़ी के भजन प्रतिदिन सुन सकते हैं और दिनभर उनके मधुर गीत-संगीत का आनंद लेते रहते हैं। शाम को कोई भी संगीत का कार्यक्रम मोहम्मद रफ़ी के गीतों के बिना अधूरा है।

1950 से 1970 तक गीत-गायन में उनका एकछत्र राज रहा। संगीतकार नौशाद, मदन मोहन, ओ. पी. नैय्यर और रवि के सर्वाधिक गीत रफ़ी साहब ने ही गाए। इतना ही नहीं, शंकर-जयकिशन ने भी राज कपूर की फिल्मों को छोड़ दें तो मोहम्मद रफ़ी को ही प्राथमिकता देकर गीत गवाए। दिलीप कुमार, शम्मी कपूर और राजेंद्र कुमार के अधिकतम गीत रफ़ी साहब ने ही गाए।

रफ़ी साहब को छह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार प्राप्त हुए।

1961 में फिल्म चौदहवीं का चाँद का गीत, जिसे शकील बदायूंनी ने लिखा और संगीतकार रवि ने संगीत से सजाया, उसके बोल हैं—

चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो,

जो भी हो, खुदा की कसम लाजवाब हो।

आज भी प्रेमिका के सौंदर्य का यह सर्वश्रेष्ठ गीत है।

इसी तरह 1962 में हसरत जयपुरी द्वारा रचित और शंकर-जयकिशन की धुन पर बना गीत—

तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को

किसी की नज़र न लगे, "चश्मे-बद्दूर"

शब्द की विशेषता को परिभाषित करने के अंदाज़ का कोई जवाब नहीं है।

1965 में फिल्म दोस्ती का गीत, जिसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा और संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने सुमधुर संगीत से सजाया—

चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे,

फिर भी न तेरे नाम से

आवाज़ मैं न दूँगा।

इस गीत में समर्पण का जो भाव रफ़ी साहब ने अपनी आवाज़ में व्यक्त किया है, उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

1967 में हसरत जयपुरी द्वारा रचित और शंकर-जयकिशन द्वारा कालजयी बनाया गया गीत, जो भारत ही नहीं, विश्व में भी विवाह उत्सव का अंग है—

बहारों फूल बरसाओ,

मेरा महबूब आया है।

1969 में पुनः हसरत जयपुरी द्वारा रचित और शंकर-जयकिशन द्वारा संगीत से सजा गीत—

दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर,

रखूँगा मैं दिल के पास,

मत हो मेरी जान उदास।

यह प्रेम और विरह की अद्भुत अभिव्यक्ति का आभास कराता है।

1969 के बाद, नौ वर्ष पश्चात 1978 में फिल्म हम किसी से कम नहीं का मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और राहुल देव बर्मन के संगीत से सजा गीत—

क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम, वो इरादा,

भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें,

वो दिन ज़िंदगी का आख़िरी दिन होगा।

अतीत और वर्तमान का अनुपम उदाहरण है।

यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 1969 में राजेश खन्ना की फिल्म आराधना के आगमन से किशोर कुमार की माँग बढ़ गई और रफ़ी साहब के गीत कम हो गए। परंतु 1970 के बाद भी मुश्किल रागों के गीत संगीतकारों ने मोहम्मद रफ़ी से ही गवाए। स्वयं किशोर कुमार संगीतकारों से कहते थे कि मुश्किल क्लासिकल गीत रफ़ी साहब से ही गवाएँ, मेरी रेंज उनके समान नहीं है।

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि फिल्म बैजू बावरा के गीत—

"मन तड़पत हरि दर्शन को आज"

"ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले"

"तू गंगा की मौज, मैं जमुना का धारा"

रफ़ी साहब के अलावा कोई गा सकता था।

मोहम्मद रफ़ी ने सात हजार से अधिक गीत गाए, जिनमें विभिन्न भाषाओं के गीत शामिल हैं। 1967 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया और उन्हें अनेक संस्थाओं ने भी सम्मानित किया।

फिल्म क्रोध में मोहम्मद रफ़ी पर आनंद बख्शी जी द्वारा लिखे गीत को लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीतबद्ध कर श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत किया। यह गीत अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया है, जिसे मोहम्मद अज़ीज़ ने गाया है। यह रफ़ी साहब के व्यक्तित्व का मार्मिक चित्रण है। आनंद बख्शी जी लिखते हैं—

ना फ़नकार तुझ-सा तेरे बाद आया,

मोहम्मद रफ़ी, तू बहुत याद आया।

सुरों की सुरीली वो परवाज़ तारीख़,

बहुत खूबसूरत आवाज़ तेरी।

ज़माने को जिसने दीवाना बनाया,

मोहम्मद रफ़ी, तू बहुत याद आया।

तेरे ग़म के चर्चे बहुत पुराने,

तुझसे बिछड़े हुए ज़माने।

तेरा नाम कोई नहीं भूल पाया,

मोहम्मद रफ़ी, तू बहुत याद आया।

चले जाएँगे हम, मुसाफ़िर हैं सारे,

मगर शिकवा है लब पे हमारे।

तुझे कितनी जल्दी खुदा ने बुलाया,

मोहम्मद रफ़ी, तू बहुत याद आया।

यह भी संगीत प्रेमियों के लिए दुखद है कि सादगी पसंद मोहम्मद रफ़ी 55 वर्ष की आयु में ही 31 जुलाई 1980 को हमसे जुदा हो गए। वहीं किशोर कुमार 58 वर्ष और मुकेश भी 53 वर्ष की आयु में ही दुनिया छोड़ गए। तीनों महान गायकों की मृत्यु हृदयाघात से हुई।

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आज का राशिफल

अपने हितैषी समझे जाने वाले ही पीठ पीछे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे। पठन पाठन में स्थिति कमजोर रहेगी। किसी से वाद-विवाद अथवा कहासुनी होने का भय रहेगा। मानसिक एवं शारीरिक शिथिलता पैदा होगी। जल्दबाजी में कोई भूल संभव है। आय-व्यय समान्य रहेगा। शुभांक-5-7-9

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