भोपाल, 31 जुलाई।
मध्यप्रदेश की 8 करोड़ से अधिक आबादी को गुणवत्तापूर्ण और सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना आज सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। बीते दो दशकों में राज्य ने सड़क, बिजली और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। अब जब हम प्रगतिशील और उन्नत प्रदेश बनने की दौड़ में हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या हमारे पास इतने डॉक्टर हैं, जो हर गांव, हर ब्लॉक और हर जिले में लोगों का इलाज कर सकें? क्या हमारे मेडिकल कॉलेज इतने हैं कि हर मेधावी छात्र को डॉक्टर बनने का अवसर मिल सके? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एक मध्यमवर्गीय परिवार का बेटा या बेटी अपने दम पर एमबीबीएस की पढ़ाई कर सकता है? इन सवालों का जवाब आंकड़ों में तलाशने पर एक कठोर सच्चाई सामने आती है। देश में एमबीबीएस की सबसे अधिक फीस आज मध्यप्रदेश में है और यही राज्य के स्वास्थ्य भविष्य की सबसे बड़ी बाधा बनती जा रही है।
आज मध्यप्रदेश के निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की पूरी पढ़ाई पर 50 लाख से एक करोड़ रुपए तक का खर्च आता है। सरकारी कॉलेजों में भी फीस और अन्य खर्च मिलाकर 15 से 20 लाख रुपए लग जाते हैं। यह राशि किसी किसान, शिक्षक या छोटे व्यापारी के लिए लगभग असंभव है। नतीजा यह है कि हर साल हजारों मेधावी छात्र नीट परीक्षा पास करने के बाद भी डॉक्टर नहीं बन पाते, क्योंकि उनके माता-पिता इतनी फीस नहीं दे सकते। वे या तो पढ़ाई छोड़ देते हैं, दूसरे राज्यों में सस्ती शिक्षा तलाशते हैं या विदेश चले जाते हैं। इस तरह मध्यप्रदेश अपना ही प्रतिभाशाली मानव संसाधन खो देता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन मध्यप्रदेश में यह अनुपात काफी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में पीएचसी और सीएचसी में डॉक्टरों के अनेक पद खाली पड़े हैं। जो डॉक्टर नियुक्त होते भी हैं, वे कुछ वर्षों बाद बड़े शहरों या निजी अस्पतालों का रुख कर लेते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि महंगी पढ़ाई के कारण उन पर भारी कर्ज होता है, जिसे चुकाने के लिए वे अधिक आय वाले विकल्प चुनते हैं।
यदि सरकार सचमुच स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती है, तो सबसे पहले चिकित्सा शिक्षा को सस्ता करना होगा। शिक्षा महंगी होगी तो डॉक्टर कम बनेंगे और डॉक्टर कम होंगे तो अस्पतालों की इमारतें और आधुनिक मशीनें भी बेकार साबित होंगी। सरकार ने पिछले वर्षों में नए मेडिकल कॉलेज खोले हैं और आधारभूत ढांचे पर निवेश भी बढ़ाया है, लेकिन जब तक फीस आम परिवार की पहुंच में नहीं आएगी, तब तक इस विस्तार का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा।
पड़ोसी राज्यों में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फीस मध्यप्रदेश की तुलना में कम है। कई राज्यों ने निजी कॉलेजों की फीस नियंत्रित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई है। मध्यप्रदेश भी ऐसा मॉडल अपना सकता है। सरकार निजी कॉलेजों को रियायतें देकर उनसे यह अनुबंध कर सकती है कि वे कम-से-कम 50 प्रतिशत सीटों पर सरकारी कॉलेजों के समान शुल्क लें। इससे हजारों प्रतिभाशाली छात्रों को राहत मिलेगी।
छात्रवृत्ति और शिक्षा ऋण की व्यवस्था में भी सुधार की जरूरत है। वर्तमान शिक्षा ऋण महंगे हैं और गारंटी की शर्तें भी कठिन हैं। सरकार डॉक्टर बनने वाले छात्रों के लिए कम ब्याज वाली विशेष शिक्षा ऋण योजना शुरू कर सकती है। यदि कोई छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद निश्चित अवधि तक ग्रामीण क्षेत्र में सेवा करे, तो उसका ऋण आंशिक या पूर्ण रूप से माफ किया जा सकता है। इससे गरीब छात्रों को अवसर मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता भी बढ़ेगी।
मध्यमवर्ग इस देश की रीढ़ है। एक किसान का बेटा, सरकारी कर्मचारी की बेटी या छोटे दुकानदार का बच्चा यदि मेधावी है, तो उसे डॉक्टर बनने का समान अवसर मिलना चाहिए। लेकिन जब फीस ही इतनी अधिक होगी, तो उसका सपना अधूरा रह जाएगा। यह केवल एक परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे समाज का नुकसान है, क्योंकि हर नया डॉक्टर हजारों लोगों के बेहतर स्वास्थ्य से जुड़ा होता है।
पिछले दो दशकों में मध्यप्रदेश ने विकास के कई नए आयाम स्थापित किए हैं, लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अभी लंबा सफर बाकी है। यदि हम वास्तव में उन्नत प्रदेश बनना चाहते हैं, तो यह स्वीकार करना होगा कि स्वास्थ्य और शिक्षा व्यापार नहीं, बल्कि जनसेवा हैं। एमबीबीएस की फीस कम करना केवल छात्रों को राहत देना नहीं, बल्कि 8 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य भविष्य को सुरक्षित करना है।
सरकार को तत्काल सभी मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना की समीक्षा कर एक समान और तर्कसंगत नीति लागू करनी चाहिए। निजी कॉलेजों से संवाद कर उन्हें इस प्रयास में सहभागी बनाया जाए और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटों की संख्या भी बढ़ाई जाए, ताकि अधिक से अधिक छात्रों को कम खर्च में चिकित्सा शिक्षा मिल सके।
एक स्वस्थ मध्यप्रदेश का सपना तभी पूरा होगा, जब हर गांव में डॉक्टर होगा और हर डॉक्टर मध्यप्रदेश का होगा। यह तभी संभव है, जब राज्य अपने ही मेधावी युवाओं को डॉक्टर बनने का अवसर दे। सरकार की प्राथमिकता यदि स्वास्थ्य है, तो उसकी शुरुआत चिकित्सा शिक्षा को सुलभ और किफायती बनाने से ही होनी चाहिए। सस्ती चिकित्सा शिक्षा ही भविष्य में सस्ता और सुलभ स्वास्थ्य सुनिश्चित करेगी और यही एक प्रगतिशील तथा उन्नत मध्यप्रदेश की पहचान बनेगी।
















