जबलपुर, 31 जुलाई।
मध्यप्रदेश की सड़कों की खस्ताहाल स्थिति अब केवल जनता की शिकायत का विषय नहीं रह गई है, बल्कि न्यायालय के कठघरे में पहुंच चुकी है। जबलपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पूछा कि जब न्यूक्लियर पावर प्लांट बन सकते हैं और समुद्र के नीचे मेट्रो चल सकती है, तो टिकाऊ सड़कें क्यों नहीं बन सकतीं? यह सवाल पूरे सिस्टम की नाकामी को उजागर करता है।
प्रदेश की सड़कों का हाल किसी से छिपा नहीं है। बरसात में गड्ढे तालाब बन जाते हैं और गर्मी में वही गड्ढे दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। याचिका के अनुसार, वर्ष 2020 से 2023 के बीच मध्यप्रदेश सड़क हादसों में देश में दूसरे स्थान पर रहा। वर्ष 2023 में गड्ढों से जुड़े हादसों में 31.4 प्रतिशत वृद्धि हुई और 5,840 दुर्घटनाओं में 2,161 लोगों की जान चली गई। ये केवल आंकड़े नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की त्रासदी हैं।
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्य सरकार, एनएचएआई, एमपीआरडीसी और नगरीय प्रशासन विभाग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। लेकिन जनता जानती है कि हर बार बजट, बरसात या ठेकेदारों के बहाने सामने आते हैं। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद टिकाऊ सड़कें क्यों नहीं बन रहीं, इसका जवाब अब देना ही होगा।
याचिकाकर्ता ने पुणे की 50 वर्ष पुरानी सड़क का उदाहरण देते हुए पूछा कि जब उस समय टिकाऊ सड़क बन सकती थी, तो आज आधुनिक तकनीक के दौर में मध्यप्रदेश में क्यों नहीं? यह केवल इंजीनियरिंग का नहीं, बल्कि नीयत और जवाबदेही का प्रश्न है।
सरकार को केवल जवाब दाखिल करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सड़क निर्माण और मरम्मत में गुणवत्ता सुनिश्चित करने, थर्ड पार्टी ऑडिट कराने और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई करने की आवश्यकता है। यदि देश समुद्र के नीचे मेट्रो और अंतरिक्ष में यान भेज सकता है, तो अपने नागरिकों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ सड़कें बनाना भी संभव है। जरूरत केवल इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और जवाबदेही की है।















