भोपाल, 31 जुलाई।
मध्यप्रदेश में बिजली को लेकर जो हालात बने हैं, वे किसी मजाक से कम नहीं हैं। एक तरफ सरकार 24 घंटे बिजली देने के बड़े-बड़े दावे करती है, दूसरी तरफ शहरों से लेकर गांवों तक अघोषित कटौती ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। गर्मी के इस मौसम में बिजली की कमी से आमजन, किसान और छोटे व्यापारी सबसे अधिक परेशान हैं। विडंबना यह है कि बिजली कम मिल रही है, लेकिन बिलों का करंट लगातार बढ़ता जा रहा है।
भोपाल, इंदौर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में भी रोज चार से छह घंटे तक बिजली कटौती हो रही है। ट्रांसफार्मर खराब होने के नाम पर मोहल्लों में घंटों अंधेरा रहता है। बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे, मरीज गर्मी से बेहाल हैं और छोटे दुकानदार इन्वर्टर व जनरेटर के अतिरिक्त खर्च से परेशान हैं। करोड़ों रुपए खर्च कर स्मार्ट सिटी बनाने का दावा करने वाले शहर आज बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति इससे भी बदतर है। किसानों को सिंचाई के लिए रात में आठ घंटे बिजली देने का वादा किया गया था, लेकिन लोड शेडिंग के कारण मोटरें नहीं चल पा रहीं। धान और सोयाबीन की फसलें पानी के अभाव में प्रभावित हो रही हैं। किसान डीजल खरीदकर सिंचाई करने को मजबूर हैं। दूसरी ओर बिजली कंपनियां फ्यूल सरचार्ज और पावर परचेज एडजस्टमेंट के नाम पर बिल बढ़ा रही हैं। किसान को न समय पर बिजली मिल रही है और न ही उसकी लागत का उचित मूल्य।
सबसे बड़ा सवाल बिजली बिलों को लेकर है। बिजली उत्पादन में गिरावट आने के बावजूद उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त सरचार्ज का बोझ डाला जा रहा है। 200 से 500 यूनिट तक के बिलों में 87 रुपए से लेकर 300 रुपए तक अतिरिक्त राशि जोड़ी जा रही है। यानी बिजली कम मिली, लेकिन भुगतान ज्यादा करना पड़ रहा है। कंपनियां कोयले और गैस की बढ़ी कीमतों का तर्क देती हैं, जबकि उत्पादन और आपूर्ति में कमी उनकी योजना और प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर करती है।
मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर को दूर करने के लिए नई उत्पादन इकाइयों, बेहतर रखरखाव और लाइन लॉस रोकने की दिशा में अपेक्षित प्रयास नहीं हुए। इसका खामियाजा ईमानदार उपभोक्ता भुगत रहा है। बिजली आज विलासिता नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और कृषि की बुनियादी जरूरत है।
सरकार को बिजली कंपनियों की कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय जांच करानी चाहिए, उत्पादन बढ़ाने के ठोस उपाय करने चाहिए और सरचार्ज के नाम पर जनता पर अतिरिक्त बोझ डालने की प्रवृत्ति रोकनी चाहिए। बिलिंग व्यवस्था पारदर्शी हो, कटौती का समय पहले से घोषित किया जाए और उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली उपलब्ध कराई जाए। जनता का सीधा सवाल है—यदि पूरी बिजली नहीं दे सकते तो पूरा बिल क्यों? मध्यप्रदेश की जनता अब अंधेरे और महंगे बिल, दोनों से मुक्ति चाहती है।















