भोपाल, 03 अगस्त।
देश में टैक्स फाइलिंग को लेकर जो माहौल बन रहा है, वह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच और जिम्मेदारी का बदलता हुआ चेहरा है। कभी रिटर्न भरना केवल बड़े व्यापारियों और नौकरीपेशा लोगों की मजबूरी माना जाता था, लेकिन अब आम नागरिक भी इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा मानने लगा है। मध्यप्रदेश में इस बदलाव की झलक सबसे साफ दिखाई दे रही है, जहां वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक 38 लाख से अधिक लोगों ने रिटर्न दाखिल कर दिए हैं और अंतिम तिथि 31 जुलाई तक यह संख्या 40 लाख के पार जाने की उम्मीद है। यह वृद्धि केवल संख्या नहीं है, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि करदाता अब जागरूक हुआ है और सरकार पर उसका भरोसा बढ़ा है।
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण सरल और पारदर्शी व्यवस्था है। पहले रिटर्न भरना एक जटिल प्रक्रिया मानी जाती थी। फॉर्म समझ नहीं आते थे, दस्तावेज इकट्ठा करने में दिक्कत होती थी और चार्टर्ड अकाउंटेंट पर निर्भरता बढ़ जाती थी। लेकिन अब ऑनलाइन पोर्टल, मोबाइल ऐप और ऑटो-फिल की सुविधा ने काम को आसान कर दिया है। फॉर्म-16, फॉर्म-26एएस और बैंक लेनदेन की जानकारी पहले से पोर्टल पर उपलब्ध होती है, जिससे करदाता को सिर्फ जांच कर सबमिट करना होता है। सरकार ने 7 लाख रुपये तक की आय को टैक्स फ्री कर दिया है, जिससे मध्यम वर्ग को सीधी राहत मिली है और वह भी अब बिना डर के रिटर्न भर रहा है। टीडीएस रिफंड सीधे बैंक खाते में आने लगा है, जिससे लोगों को लगा कि टैक्स देना बेकार नहीं जाता, बल्कि उसका लाभ वापस मिलता है।
मध्यप्रदेश में यह जागरूकता शहरों के साथ-साथ कस्बों और गांवों तक पहुंची है। भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में तो रिटर्न की रफ्तार पहले से तेज थी, लेकिन अब सागर, रीवा, सतना और छिंदवाड़ा जैसे जिलों में भी लोग समय पर रिटर्न भर रहे हैं। इसका कारण सरकारी योजनाओं से जुड़ाव भी है। आज लोन, पासपोर्ट, वीजा और सरकारी सब्सिडी के लिए आय प्रमाण के रूप में आयकर रिटर्न मांगा जाता है। इसलिए युवा वर्ग और स्वरोजगार करने वाले लोग भी इसे जरूरी मानने लगे हैं। महिलाएं भी अब बड़ी संख्या में रिटर्न भर रही हैं, क्योंकि वे स्वावलंबी बन रही हैं और अपनी आय का हिसाब रखना चाहती हैं।
लेकिन हर अच्छी शुरुआत के साथ चुनौतियां भी आती हैं। इस बार सबसे बड़ी चुनौती आयकर विभाग के सर्वर की बनी है। अंतिम तिथि नजदीक आते ही पोर्टल पर दबाव इतना बढ़ जाता है कि वेबसाइट धीमी हो जाती है, फाइल अपलोड नहीं होती और कई बार घंटों तक लॉगिन ही नहीं हो पाता। चार्टर्ड अकाउंटेंट का कहना है कि वे रात-रात भर जागकर रिटर्न भरते हैं, लेकिन सर्वर की वजह से काम अटक जाता है। करदाता भी परेशान हैं, क्योंकि देर से रिटर्न भरने पर लेट फीस लगती है और कुछ छूटें भी हाथ से निकल जाती हैं। 5,000 रुपये तक की लेट फीस का प्रावधान है और कम आय वाले करदाताओं के लिए यह 1,000 रुपये है। इसलिए लोग अंतिम समय का इंतजार नहीं करना चाहते।
आयकर विभाग ने इन दिक्कतों को स्वीकार किया है और कहा है कि सर्वर की क्षमता बढ़ाई गई है तथा अतिरिक्त तकनीकी टीम लगाई गई है। विभाग लगातार अपील कर रहा है कि लोग अंतिम दिन का इंतजार न करें और जल्द रिटर्न भरें। विभाग का तर्क भी सही है, क्योंकि अंतिम तीन-चार दिनों में करोड़ों लोग एक साथ लॉगिन करते हैं, तो कोई भी सिस्टम लड़खड़ा सकता है। लेकिन सवाल यह भी है कि जब हर साल यही स्थिति बनती है, तो पहले से तैयारी क्यों नहीं होती? क्यों न पहले से सर्वर अपग्रेड किया जाए और लोगों को पहले से जागरूक किया जाए, ताकि भीड़ अंतिम समय में न लगे?
टैक्स संग्रह के आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि मध्यप्रदेश आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के पहले चार महीनों में ही प्रदेश से 32 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रत्यक्ष कर संग्रह हुआ है। यह पिछले साल की तुलना में 13 प्रतिशत अधिक है। भोपाल मंडल ने तो 97 प्रतिशत लक्ष्य पहले ही प्राप्त कर लिया है और इस वर्ष 32 हजार 300 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 31 हजार 67 करोड़ रुपये था। यानी वृद्धि साफ दिखाई दे रही है। यह पैसा सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च होता है। इसलिए जब कोई नागरिक रिटर्न भरता है, तो वह केवल फॉर्म नहीं भरता, बल्कि अपने राज्य के विकास में योगदान देता है।
रिटर्न फाइलिंग बढ़ने का एक कारण विभाग की सख्ती और तकनीक भी है। अब हर बड़ा लेनदेन, बैंक जमा और निवेश की जानकारी सीधे विभाग के पास पहुंच जाती है। इसलिए जो लोग पहले बचते थे, उन्हें भी अब नोटिस मिल रहा है। दूसरी ओर विभाग ने रिफंड प्रक्रिया को तेज किया है। पिछले साल 168 करोड़ रुपये का रिफंड जारी किया गया था और इस साल भी यह प्रक्रिया और तेज हुई है। जब पैसा समय पर वापस आता है, तो लोगों का विश्वास बढ़ता है और वे अगली बार भी समय पर रिटर्न भरते हैं।
फिर भी कुछ क्षेत्रों में काम बाकी है। ग्रामीण इलाकों में अब भी डिजिटल साक्षरता की कमी है। वहां के लोग ऑनलाइन प्रक्रिया से डरते हैं और चार्टर्ड अकाउंटेंट की फीस देने में असमर्थ होते हैं। कई बार फॉर्म में छोटी गलती से पूरा रिटर्न निरस्त हो जाता है और दोबारा भरना पड़ता है। वेतनभोगियों को कई बार फॉर्म-16 समय पर नहीं मिलता, जिससे वे देर से रिटर्न भरते हैं। इन समस्याओं के लिए सरकार को और अधिक जागरूकता अभियान चलाने होंगे। स्कूल, कॉलेज और पंचायत स्तर पर कार्यशालाएं करनी होंगी, ताकि हर नागरिक समझ सके कि रिटर्न भरना कठिन नहीं है। आयकर विभाग ने इस बार सोशल मीडिया, वेबिनार और हेल्पलाइन के जरिए लोगों को जोड़ने की कोशिश की है और उसका असर भी दिख रहा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं, जानकारी ले रहे हैं और समय पर काम कर रहे हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि जब नागरिक और सरकार के बीच संवाद बढ़ता है, तो भरोसा भी बढ़ता है और व्यवस्था भी मजबूत होती है।
टैक्स देना अब बोझ नहीं रहा, बल्कि यह गर्व की बात बन गई है। जब 40 लाख लोग रिटर्न भरते हैं, तो इसका मतलब है कि 40 लाख लोग अपने कर्तव्य को समझ रहे हैं। वे जानते हैं कि उनके दिए हुए टैक्स से ही गांव में सड़क बनती है, स्कूल में शिक्षक आता है और अस्पताल में दवा मिलती है। मध्यप्रदेश इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और अगर यही रफ्तार रही, तो आने वाले वर्षों में हमारा राज्य न केवल टैक्स संग्रह में, बल्कि कर संस्कृति में भी देश के लिए उदाहरण बनेगा।
बची हुई अवधि में भी लोग समय रहते रिटर्न दाखिल करें। सर्वर की समस्या को लेकर घबराएं नहीं, बल्कि पहले से तैयारी करें और विभाग भी अपनी जिम्मेदारी निभाए। क्योंकि एक मजबूत अर्थव्यवस्था और एक मजबूत समाज, दोनों तभी बनेंगे, जब हम सब मिलकर अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। टैक्स की आदत से ही नया मध्यप्रदेश बन रहा है और यह बदलाव हर नागरिक की भागीदारी से संभव हो रहा है।
















