भोपाल, 03 अगस्त।
मध्यप्रदेश सरकार हर साल दावा करती है कि गांवों को शहरों की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है। हजारों करोड़ का बजट पास होता है, बड़ी-बड़ी योजनाएं बनती हैं और हर मंच से कहा जाता है कि अब गांवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी नहीं रहेगी। लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। ताजा महालेखाकार की रिपोर्ट ने सरकार के इन दावों की पोल खोल दी है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभागों ने मिलकर 28,504 करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन इस पैसे का कोई स्पष्ट हिसाब-किताब नहीं है। न काम दिख रहा है, न रिकॉर्ड मिल रहा है और न ही अधिकारी जवाब दे रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अकेले पंचायती राज विभाग का बजट 20,453 करोड़ रुपये था और ग्रामीण विकास विभाग का बजट 8,051 करोड़ रुपये। यानी कुल मिलाकर इतनी बड़ी राशि कि प्रदेश के हर गांव की सूरत बदली जा सकती थी। हर गांव में पक्की सड़क, हर घर में नल का पानी, हर स्कूल में शिक्षक और हर स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर उपलब्ध हो सकते थे। लेकिन आज भी अधिकांश गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सड़कें टूटी हैं, नालियां जाम हैं, पीने का पानी दूर से लाना पड़ता है और अस्पतालों में दवाइयां नहीं मिलतीं। आखिर इतना पैसा गया कहां?
महालेखाकार की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इन दोनों विभागों के खर्च का सही ऑडिट उपलब्ध नहीं है। कई जिलों में फर्जी बिल बनाकर भुगतान कर दिया गया। कई जगह काम हुआ ही नहीं, लेकिन कागजों पर पूरा दिखा दिया गया। कई स्थानों पर सामग्री खरीदी ही नहीं गई, लेकिन स्टॉक रजिस्टर में उसकी प्रविष्टि कर दी गई। ऐसी अनियमितताओं के कारण हर साल करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है, लेकिन जिम्मेदारों पर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ फाइलें घूम रही हैं।
ग्रामीण विकास की योजनाओं का हाल भी कुछ ऐसा ही है। मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं में करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन नतीजे निराशाजनक हैं। कई जगह आवास अधूरे पड़े हैं, कई गांवों में शौचालय बने ही नहीं हैं। मनरेगा में फर्जी मजदूर दिखाकर पैसा निकाला गया है और पंचायतों को मिलने वाला पैसा भी सही तरीके से उपयोग नहीं हो पा रहा, क्योंकि सरपंचों और सचिवों को न तकनीकी जानकारी है और न ही पर्याप्त प्रशासनिक सहयोग। वे पूरी तरह अधिकारियों और ठेकेदारों के भरोसे हैं।
इसका असर सीधे आम जनता पर पड़ रहा है। गांव के लोग कहते हैं कि हर चुनाव में नेता आकर बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव के बाद कोई झांकने भी नहीं आता। स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, अस्पतालों में दवाएं नहीं हैं, सड़कों पर गड्ढे हैं और युवाओं के लिए रोजगार नहीं है। लोग पूछते हैं कि अगर इतना बजट खर्च हो रहा है तो फिर गांवों की हालत क्यों नहीं सुधर रही? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
समस्या सिर्फ पैसे की नहीं है, बल्कि मंशा और निगरानी की भी है। सरकार बजट तो बढ़ा देती है, लेकिन यह नहीं देखती कि वह पैसा सही जगह लग भी रहा है या नहीं। जिला और ब्लॉक स्तर पर अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं है, जिसके कारण फाइलें महीनों तक अटकी रहती हैं। पंचायतों को अधिकार तो दे दिए गए, लेकिन संसाधन और प्रशिक्षण नहीं दिया गया। इसलिए वे योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू नहीं कर पा रही हैं।
सरकार को तुरंत ठोस कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले हर गांव में एक सार्वजनिक बोर्ड लगाया जाए, जिसमें लिखा हो कि इस वर्ष कितना पैसा आया और किस काम में खर्च हुआ। दूसरा, महालेखाकार की रिपोर्ट के आधार पर दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई की जाए। तीसरा, सोशल ऑडिट को अनिवार्य किया जाए, ताकि गांव के लोग स्वयं तय करें कि उनके गांव में क्या काम हुआ और क्या नहीं। पंचायतों को तकनीकी मदद और प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे योजनाओं को सही तरीके से लागू कर सकें।
अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो गांवों और शहरों के बीच की खाई और बढ़ती जाएगी। सरकार के सारे दावे खोखले साबित होंगे और ग्रामीण जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा। मध्यप्रदेश को तभी विकसित राज्य कहा जा सकता है, जब उसके गांव वास्तव में विकसित हों, न कि सिर्फ कागजों पर।
गांव देश की रीढ़ हैं। अगर रीढ़ कमजोर होगी तो पूरा शरीर बीमार रहेगा। इसलिए अब वक्त आ गया है कि सरकार दावों से आगे बढ़कर काम करे और यह साबित करे कि गांवों के लिए आवंटित हर रुपया वास्तव में गांव तक पहुंच रहा है।
















