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संपादकीय
03 Aug, 2026

नागरिकों की सुरक्षा सरकार की पहली जिम्मेदारी: अदालत का आदेश चेतावनी भी, दिशा भी

सुप्रीम कोर्ट ने युद्ध क्षेत्रों में फंसे भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके परिवारों को सहायता देने के लिए सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं।

नई दिल्ली, 03 अगस्त।

जब कोई देश युद्ध की आग में झुलस रहा हो और उसके नागरिक उस संघर्ष में फंस जाएं, तब सरकार की भूमिका केवल कूटनीतिक बयान देने तक सीमित नहीं रह जाती। उस समय सबसे बड़ी परीक्षा यह होती है कि राज्य अपने लोगों को सुरक्षित वापस लाने के लिए कितनी तत्परता और संवेदनशीलता दिखाता है। सुप्रीम कोर्ट का हालिया आदेश इसी जिम्मेदारी की याद दिलाता है। यह सरकार को स्पष्ट संदेश देता है कि युद्ध क्षेत्र में फंसे भारतीयों की सुरक्षा के लिए त्वरित और ठोस कदम उठाना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

विदेश मंत्रालय को तुरंत एक नोडल अधिकारी नियुक्त करना चाहिए, जो युद्ध में मारे गए, घायल हुए या लापता भारतीयों के परिवारों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखे। यह अधिकारी केवल औपचारिक पद नहीं होगा, बल्कि उन परिवारों की पहली उम्मीद बनेगा, जो अपने बेटे, भाई या पति की खबर के लिए दिन-रात इंतजार कर रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा है कि ऐसे परिवारों की पहचान कर उन्हें हर जरूरी जानकारी और सहायता उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे अनिश्चितता के अंधेरे में न रहें।

यह आदेश किसी एक मामले तक सीमित नहीं है। युद्ध के समय सबसे अधिक प्रभावित मजदूर, छात्र और कामगार होते हैं, जो रोजगार या शिक्षा के लिए विदेश गए होते हैं। उनके पास न तो तत्काल वापसी के संसाधन होते हैं और न ही पर्याप्त सुरक्षा। ऐसे में राज्य का दायित्व और बढ़ जाता है। नागरिक ने देश पर भरोसा करके विदेश का रुख किया था, इसलिए संकट की घड़ी में उसका साथ देना भी सरकार का कर्तव्य है।

सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह याद दिलाता है कि विदेश नीति केवल द्विपक्षीय संबंधों और व्यापार समझौतों तक सीमित नहीं होती। उसका सबसे मानवीय स्वरूप तब सामने आता है, जब अपने नागरिक संकट में हों। ऐसे समय त्वरित निर्णय, बेहतर समन्वय और स्पष्ट संवाद की आवश्यकता होती है। नोडल अधिकारी की नियुक्ति इसी जरूरत का उत्तर है, ताकि सूचनाओं का भ्रम न फैले और परिवारों को दर-दर भटकना न पड़े।

भारत ने पहले भी अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान अपने नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने के लिए बड़े अभियान चलाए हैं। हर बार यह अनुभव मिला कि समय पर तैयारी और लगातार संवाद सबसे जरूरी होते हैं। कई बार सूचना मिलने में हुई देरी परिवारों की पीड़ा बढ़ा देती है और समन्वय के अभाव में राहत भी देर से पहुंचती है। अदालत का आदेश इसी कमी को दूर करने का प्रयास है।

इस आदेश को केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। एक मां, पत्नी या पिता के लिए, जिसका अपना किसी युद्ध क्षेत्र में फंसा हो, हर पल चिंता से भरा होता है। ऐसे समय सरकार की ओर से नियमित जानकारी, सहायता और भरोसा देना उतना ही जरूरी है, जितना राहत अभियान चलाना। युद्ध के दौरान अफवाहें भी तेजी से फैलती हैं। ऐसे में नोडल अधिकारी की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार को इस आदेश को केवल फाइलों तक सीमित न रखकर दूतावासों को सक्रिय करना चाहिए और हर प्रभावित परिवार तक एकल खिड़की प्रणाली के माध्यम से सहायता पहुंचानी चाहिए। यही एक जिम्मेदार राष्ट्र की पहचान है कि वह संकट की हर घड़ी में अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखे।

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