भोपाल, 03 अगस्त।
प्रदेश के नर्सिंग कॉलेज घोटाले ने शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। राज्य सरकार को अब तक कानूनी प्रक्रिया और छात्रों के समायोजन पर 760 करोड़ 62 लाख रुपये खर्च करने पड़े हैं। यह राशि बताती है कि नियामक स्तर की लापरवाही का बोझ अंततः सरकारी खजाने और जनता पर पड़ता है।
वर्ष 2022 की जांच में 760 नर्सिंग कॉलेजों में गंभीर अनियमितताएं सामने आई थीं। कई संस्थानों में न पर्याप्त बुनियादी ढांचा था, न योग्य फैकल्टी और न ही क्लिनिकल सुविधाएं, फिर भी उन्हें मान्यता मिल गई। इसका खामियाजा हजारों छात्रों को भुगतना पड़ा, जिनका भविष्य अधर में लटक गया।
घोटाला सामने आने के बाद सरकार को छात्रों को दूसरे कॉलेजों में स्थानांतरित करना पड़ा। इसके साथ ही कॉलेज संचालकों से कानूनी लड़ाई, वरिष्ठ अधिवक्ताओं की फीस और प्रशासनिक खर्च लगातार बढ़ते गए। महाधिवक्ता को प्रति पेशी 95 हजार रुपये तक और वरिष्ठ अधिवक्ताओं को करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया। इस पूरी प्रक्रिया ने सरकारी खर्च को 760 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचा दिया।
यदि शुरुआत में ही मान्यता प्रक्रिया पारदर्शी और सख्त होती, तो न इतना बड़ा घोटाला होता और न ही जनता का धन इस तरह खर्च करना पड़ता। यही राशि ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, नए स्वास्थ्य केंद्र खोलने और नर्सों की कमी दूर करने में उपयोग की जा सकती थी।
अब केवल कानूनी लड़ाई पर्याप्त नहीं है। दोषी अधिकारियों और कॉलेज संचालकों की जवाबदेही तय हो, मान्यता प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बने और प्रभावित छात्रों को राहत के साथ फीस वापसी की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए। यह मामला याद दिलाता है कि प्रशासनिक लापरवाही की कीमत आखिरकार जनता को ही चुकानी पड़ती है।















