मुंबई, 24 सितंबर ।
अरविन्द पाण्डेय के निर्देशन में बनी फिल्म 'लव लॉटरी' वैवाहिक विवादों, पुरुषों के कानूनी अधिकारों और मीडिया ट्रायल जैसे संवेदनशील विषयों को मर्डर मिस्ट्री तथा कोर्टरूम ड्रामे के ताने-बाने में पिरोकर परदे पर उतारती है। कहानी की शुरुआत भरनी वर्मा (हेली दारूवाला) की एक सूखी और रहस्यमयी हत्या से होती है, जिसका इल्जाम उसके पति कार्तिक सक्सेना (अक्षय ओबरॉय) पर आ जाता है। पुलिस अधिकारी विक्रम बिष्ट (कबीर दुहन सिंह) द्वारा कार्यालय से गिरफ्तार किए जाने के बाद, कार्तिक रिमांड के दौरान अपनी शादी के शुरुआती दिनों से लेकर आपसी अनबन और अलगाव की पूरी दास्तान बयान करता है।
फिल्म अपनी गति बनाए रखते हुए धीरे-धीरे यह रहस्य सुलझाने की कोशिश करती है कि क्या कार्तिक वाकई हत्यारा है या फिर इस साजिश के पीछे कोई अन्य राज छुपा है। निर्देशक ने गंभीर विषयों को महज भाषणबाजी तक सीमित न रखकर कहानी का अहम हिस्सा बनाया है। पहले चरण में यह फिल्म जहां एक तरफ गहन जांच-पड़ताल और सस्पेंस पर टिकी रहती है, वहीं दूसरे चरण में यह सीधे तौर पर अदालत की बहसों और वैवाहिक तनातनी की तरफ मुड़ जाती है। इसके अलावा, समाज और मीडिया द्वारा अदालत से पहले ही किसी व्यक्ति को गुनहगार मान लेने की मानसिकता पर भी प्रभावी सवाल उठाए गए हैं।
कहानी का एक बड़ा पहलू पुरुष-केंद्रित दृष्टिकोण को सामने लाना है, जिसमें पारिवारिक कानूनों के बीच पुरुषों के अधिकारों और मानसिक दबाव की बात की गई है। हालांकि हर दर्शक इस नजरिए से इत्तेफाक रखे यह जरूरी नहीं, लेकिन यह बहस छेड़ने में जरूर कामयाब होती है। अभिनय के मोर्चे पर अभिनेता अक्षय ओबरॉय इस फिल्म की जान साबित हुए हैं। कार्तिक के किरदार में उनका संयमित और परिपक्व अभिनय तथा क्लाइमैक्स का लंबा मोनोलॉग बेहद प्रभावशाली बन पड़ा है। वहीं, हेली दारूवाला ने भरनी के नकारात्मक और जटिल शेड्स को बेहतरीन तरीके से निभाया है, जबकि कबीर दुहन सिंह, विजयंत कोहली और अग्नि अग्यारी ने भी अपने किरदारों में पूरा न्याय किया है।
तकनीकी और संगीत पक्ष की बात करें तो अरविन्द पाण्डेय और वरुण मिश्रा के संगीत में रचे गए गीत फिल्म के माहौल के अनुकूल बैठते हैं। नवीन वी. मिश्रा की सिनेमैटोग्राफी और उत्तराखंड की खूबसूरत लोकेशंस ने फिल्म के दृश्यों को एक अलग ही गहराई दी है। कुल मिलाकर, 'लव लॉटरी' महज एक मर्डर मिस्ट्री न होकर सामाजिक सरोकारों और रिश्तों की उलझनों को सामने लाने वाला एक सार्थक प्रयास है, जिसे मजबूत अभिनय के बल पर परदे पर बेहतरीन ढंग से उतारा गया है।












