पिछले दिनों एक सम्माननीय के प्रमोशन के बाद खाली हुई कुर्सी के लिए भोपाल से लेकर दिल्ली तक माननीयों ने खूब दौड़-धूप की। हर संभावित समीकरण को साधा गया, हर संभावना को टटोला गया और हर दरवाजा खटखटाया गया। लेकिन आखिर में बाजी ऐसे साथी के हाथ लगी, जो किसी लाइन में ही नहीं था। यानी पद के लिए दौड़ने वालों की भीड़ लगी रही और जिसे दौड़ना ही नहीं था, वही मंजिल तक पहुंच गया। राजनीति में इसे ही शायद सही समय पर सही जगह खड़े रहने की कला कहते हैं।














