नई दिल्ली, 14 अक्टूबर।
सड़क केवल गिट्टी और तारकोल का नाम नहीं है, वह जीवन की रेखा है। लेकिन जब यही रेखा काली पड़ जाती है तो उसे ब्लैक स्पॉट कहा जाता है और जब कई काले धब्बे एक साथ मिल जाते हैं तो पूरा रास्ता ब्लैक कॉरिडोर बन जाता है। आज देश में हजारों किलोमीटर सड़कें ऐसी हैं, जहां बार-बार एक ही जगह हादसे हो रहे हैं। एक ही मोड़ पर गाड़ियां पलट रही हैं और एक ही चौराहे पर लोग जान गंवा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह किस्मत है या हमारी लापरवाही का नतीजा? हादसा अचानक नहीं होता, वह पहले चेतावनी देता है। सड़क बताती है कि उसकी हालत खराब है, मोड़ अपनी गलत डिजाइन का संकेत देता है और अंधेरा बताता है कि यहां रोशनी नहीं है। लेकिन हम सुनते नहीं हैं। हम तब जागते हैं, जब किसी की जान चली जाती है। अब समय आ गया है कि हम सड़क की भाषा सुनें और तकनीक की मदद से उसे समझें।
ई-डीएआर का पूरा नाम इलेक्ट्रॉनिक डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें हर हादसे की पूरी जानकारी डिजिटल रूप में दर्ज की जाती है। हादसा कहां और किस समय हुआ, मौसम कैसा था, सड़क पर रोशनी थी या नहीं, वाहन कितनी तेज गति से चल रहा था, चालक ने हेलमेट पहना था या नहीं और सड़क पर गड्ढा था या नहीं, इन सभी जानकारियों को दर्ज किया जा सकता है। पहले यह जानकारी कागजों में खो जाती थी, अब यह डेटा बनकर कंप्यूटर में सुरक्षित रहेगी।
जब हजारों हादसों का डेटा एक जगह जमा होगा तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उससे सीखकर बताएगा कि किस तरह की सड़कों पर अधिक हादसे हो रहे हैं, किस समय हादसों की संख्या बढ़ती है और किन वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की आशंका अधिक है। इससे सड़क सुरक्षा की चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।
अक्सर लोग सोचते हैं कि एआई का मतलब केवल सीसीटीवी कैमरा है, लेकिन वास्तव में यह आंकड़ों के पैटर्न पहचानने वाली तकनीक है। यदि किसी स्कूल के सामने दोपहर में बार-बार हादसे हो रहे हैं तो एआई वहां बच्चों की आवाजाही और वाहनों की गति के बीच संबंध पहचानने में मदद कर सकता है। यदि किसी हाईवे पर रात में अधिक हादसे होते हैं तो वहां रोशनी, रिफ्लेक्टर और चालकों के आराम के लिए सुविधाओं की जरूरत पहचानी जा सकती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि हादसों के बाद कार्रवाई करने के बजाय संभावित खतरे को पहले पहचानकर सुधार किया जा सकता है।
इस व्यवस्था को केवल बड़े हाईवे तक सीमित रखना उचित नहीं होगा। गांवों की सड़कों, शहरों की गलियों और कस्बों के चौराहों पर भी हादसों का खतरा रहता है। वहां साइन बोर्ड, स्पीड ब्रेकर और पर्याप्त रोशनी की कमी समस्या बढ़ा सकती है। ई-डीएआर के डेटा का प्रभावी उपयोग स्थानीय प्रशासन को अपने क्षेत्र के खतरनाक स्थान पहचानने और जरूरी सुधार करने में मदद कर सकता है। केंद्र के पास तकनीक और प्लेटफॉर्म हैं, जबकि राज्यों के पास स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी है। दोनों के बीच बेहतर समन्वय से सड़क सुरक्षा मजबूत हो सकती है।
सड़क सुरक्षा केवल सरकार का काम नहीं है, यह हम सबकी जिम्मेदारी है। तकनीक बताएगी कि खतरा कहां है, लेकिन नियमों का पालन हमें खुद करना होगा। हेलमेट नहीं पहनने, सीट बेल्ट नहीं लगाने, गलत दिशा में वाहन चलाने और नशे में गाड़ी चलाने जैसी लापरवाहियों पर रोक जरूरी है।
अब इंतजार नहीं करना चाहिए कि हादसा हो और उसके बाद व्यवस्था जागे। एआई जहां खतरे का संकेत दे, वहां समय रहते सुधार होना चाहिए। छह हजार काले धब्बों को मिटाने के लिए तकनीक, प्रशासन और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। सड़क को सुरक्षित बनाना जीवन को सुरक्षित बनाना है। एक हादसा केवल एक व्यक्ति की जान नहीं लेता, बल्कि पूरे परिवार का भविष्य छीन लेता है। इसलिए नियमों का पालन करें और सड़कों को सुरक्षित बनाने में अपनी जिम्मेदारी निभाएं।














