नई दिल्ली, 15 अक्टूबर।
लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की अपनी भूमिका और मर्यादा है। लेकिन पिछले कुछ समय से हर राजनीतिक विवाद को अदालत तक ले जाने और मनचाहा परिणाम नहीं मिलने पर उसी के खिलाफ टिप्पणी करने या विरोध जताने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह गंभीर चिंता का विषय है।
हाल ही में एक राजनीतिक समूह ने संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के बाद सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मिलने की मांग की। मुलाकात से इनकार किए जाने पर इसे सार्वजनिक रूप से प्रचारित किया गया। सवाल है कि क्या यह परंपरा उचित है? न्याय व्यवस्था व्यक्तिगत मुलाकातों से नहीं, बल्कि स्थापित प्रक्रियाओं से चलती है। यदि हर राजनीतिक दल न्यायाधीश से मिलकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करेगा, तो न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होगी। न्याय दबाव से नहीं, संविधान और कानून से चलता है।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका उपयोग संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप होना चाहिए। विरोध के मंच संसद, सड़क और जनता के बीच हैं। अदालत को राजनीतिक अखाड़ा बनाना उचित नहीं है। भारत का लोकतंत्र परिपक्व है। यहाँ चुनाव, संसद, स्वतंत्र मीडिया और न्यायपालिका जैसी संस्थाएं मौजूद हैं। दूसरे देशों की राजनीतिक अस्थिरता के उदाहरणों को भारत में लागू करने की कोशिश अनुचित है। समस्याओं का समाधान संविधान के दायरे में ही तलाशना चाहिए।
न्यायपालिका की भूमिका केवल बड़े राजनीतिक मामलों तक सीमित नहीं है। हिरासत में यातना, बंधुआ मजदूरी, औद्योगिक क्षेत्रों में सिलिकोसिस और वंचित समुदायों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मानवाधिकार संस्थाओं की वास्तविक कसौटी यही है कि वे सबसे कमजोर लोगों की आवाज कितनी प्रभावी ढंग से सुनती हैं।
यदि हर राजनीतिक लड़ाई अदालत में लड़ी जाएगी, तो संसद और कार्यपालिका की जवाबदेही का क्या होगा? अदालत को अपना काम करने देना चाहिए और राजनीति को अपना। विरोध होना चाहिए, सवाल भी उठने चाहिए, लेकिन सही मंच और संवैधानिक तरीके से। अदालत को राजनीतिक औजार बनाने से न न्याय मजबूत होगा, न लोकतंत्र।













