नई दिल्ली, 15 अक्टूबर।
कैंसर के उपचार की चर्चा जब भी होती है, तो दो बातें सबसे पहले सामने आती हैं, एक बीमारी की भयावहता और दूसरी उसके इलाज की असहनीय कीमत। एक सामान्य परिवार के लिए कैंसर का निदान केवल शारीरिक पीड़ा नहीं, बल्कि आर्थिक दंड भी बन जाता है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा कैंसररोधी दवाओं पर व्यापारिक मुनाफे की सीमा तीस प्रतिशत तय करने की जानकारी और उस पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी को देखा जाना चाहिए। सरकार का यह कहना कि उसने तीस प्रतिशत तक व्यापारिक मार्जिन तय कर दिया है, एक प्रशासनिक कदम है, लेकिन इसकी समीक्षा केवल फाइलों के आधार पर नहीं, बल्कि अस्पताल के काउंटर पर खड़े उस पिता की आंखों से होनी चाहिए, जो अपनी पत्नी के लिए कीमोथेरेपी की दवा खरीदने आया है।
दवा उद्योग में मूल्य निर्धारण की श्रृंखला लंबी है। निर्माता से लेकर आयातक, वितरक, स्टॉकिस्ट और फिर अस्पताल या खुदरा विक्रेता तक हर स्तर पर कीमत बढ़ती है। सरकार ने जिस मार्जिन को नियंत्रित किया है, वह इसी मध्यस्थ लाभ को नियंत्रित करने का प्रयास है। केंद्र का तर्क है कि यदि दवाओं की कीमतें बहुत अधिक नियंत्रित कर दी जाएंगी, तो बाजार में उनकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। कंपनियां उन दवाओं का आयात या उत्पादन बंद कर सकती हैं, जिन पर लाभ कम हो। इसलिए संतुलन आवश्यक है, ताकि दवाएं बाजार में उपलब्ध रहें और मरीजों को मिलती भी रहें। यह तर्क आर्थिक दृष्टि से समझा जा सकता है, लेकिन नैतिक दृष्टि से अधूरा है, क्योंकि प्रश्न केवल बाजार का नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार का है।
एक दवा जो कारखाने से एक हजार रुपये में निकलती है, यदि अस्पताल तक आते-आते तेरह सौ रुपये की हो जाती है, तो तीन सौ रुपये किसी अमीर व्यक्ति के लिए मामूली हो सकते हैं, लेकिन दैनिक मजदूर के लिए एक सप्ताह के भोजन के बराबर हैं। महीने भर में ऐसी दस खुराक लगने पर यह अतिरिक्त खर्च तीन हजार रुपये का बोझ बन जाता है। इसी कारण अदालत ने इसे मामूली राहत बताया है। राज्य को बाजार के संतुलन के साथ नागरिक के जीवन की गरिमा की भी चिंता करनी होगी।
इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अस्पतालों में पारदर्शिता से जुड़ा है। केंद्र ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि अस्पतालों और क्लिनिकल संस्थानों में सभी सेवाओं, जांचों, बिस्तर शुल्क और दवाओं की दरें प्रमुखता से प्रदर्शित की जाएं। यह निर्देश अत्यंत आवश्यक है। स्वास्थ्य सेवा देश के सबसे अपारदर्शी क्षेत्रों में से एक है। मरीज को भर्ती करते समय अक्सर स्पष्ट अनुमान नहीं दिया जाता और जांचों के नाम पर बिल बढ़ता रहता है। अंततः परिवार की पूरी बचत समाप्त हो जाती है। यदि दरें पहले से सार्वजनिक होंगी, तो मरीज खर्च का अनुमान लगा सकेगा, अस्पतालों की मनमानी पर अंकुश लगेगा और मरीज बेहतर तथा किफायती विकल्प चुन सकेंगे।
सरकार ने विदेशी मरीजों के लिए तय पैकेज दरें स्पष्ट करने की बात भी कही है। इसका उद्देश्य चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा देना है। यह उद्देश्य गलत नहीं है। भारत में विश्वस्तरीय डॉक्टर और अस्पताल हैं तथा विदेशी मुद्रा से देश को लाभ होता है। लेकिन जब विदेशी मरीजों के लिए पारदर्शी पैकेज बनाए जा सकते हैं, तो देश के गरीब मरीजों के लिए वही पारदर्शिता क्यों नहीं हो सकती? क्या अपने नागरिक का जीवन विदेशी मरीज से कम मूल्यवान है? यदि एक ही इलाज के लिए भारतीय मरीज से अनुचित रूप से अधिक राशि वसूली जाती है, तो यह नैतिक रूप से गलत है।
केंद्र सरकार संतुलन की बात करती है, लेकिन कैंसर जैसी बीमारी के मामले में संतुलन से अधिक संकल्प की आवश्यकता है। संकल्प यह कि कोई नागरिक केवल इसलिए इलाज से वंचित न रह जाए, क्योंकि वह महंगी दवा नहीं खरीद सकता। जीवनरक्षक दवाओं को सामान्य व्यापारिक वस्तु की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। इनके लिए सरकार को उत्पादन बढ़ाने, जन औषधि केंद्रों पर उपलब्धता सुनिश्चित करने और अस्पतालों को मरीजों के हितों की रक्षा के लिए जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है।
कई निजी अस्पताल अपने परिसर से ही दवा खरीदने की बाध्यता बनाते हैं, जहां अधिक मार्जिन वसूले जाने की आशंका रहती है। यदि मरीज को निर्धारित गुणवत्ता की दवा बाहर से खरीदने का विकल्प मिले, तो मूल्य नियंत्रण का वास्तविक लाभ उस तक पहुंच सकता है।
यह बहस केवल तीस प्रतिशत बनाम अधिक मुनाफे की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि हमारे स्वास्थ्य तंत्र का चरित्र क्या होना चाहिए। क्या वह मुनाफे पर आधारित उद्योग होगा या सेवा पर आधारित व्यवस्था? अदालत की टिप्पणी सरकार को याद दिलाती है कि मामूली राहत पर्याप्त नहीं है। देश को ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां दवा की दुकान पर कीमत के साथ भरोसा भी मिले और अस्पताल में यह सुनिश्चित हो कि जीवन बचाना प्राथमिकता है, मुनाफा नहीं।














