नई दिल्ली, 17 अक्टूबर।
आज दुनिया में तरक्की को लेकर एक पुरानी सोच रही है कि कोई देश तभी आगे बढ़ सकता है, जब वह दूसरे देश को पीछे छोड़ दे। लेकिन हाल के एक बड़े वैश्विक मंच पर इस सोच को बदलने की कोशिश हुई है। कहा गया है कि भारत की तरक्की किसी दूसरे की कीमत पर नहीं, बल्कि दुनिया के साथ और दुनिया के लिए है। यह विचार सुनने में साधारण लगता है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी वैश्विक दृष्टि छिपी हुई है।
जब दुनिया में सस्ती दवाओं की बात होती है, तो भारत का नाम सबसे पहले आता है। बताया जाता है कि दुनिया में इस्तेमाल होने वाली हर पांचवीं जेनेरिक दवा भारत में बनती है। इसका मतलब है कि अफ्रीका के किसी दूरदराज गांव या एशिया के किसी छोटे शहर में कोई गरीब मरीज इलाज करा पा रहा है, तो उसमें भारत की भूमिका है। यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है।
इसी तरह दुनिया आज भारत के युवाओं की प्रतिभा पर भरोसा करती है। सॉफ्टवेयर से लेकर अनुसंधान तक, हर क्षेत्र में भारतीय युवा काम कर रहे हैं और दुनिया को अपनी क्षमता का लाभ दे रहे हैं। खास बात यह है कि भारत ने कभी इस योगदान का ढिंढोरा नहीं पीटा और न ही कभी कहा कि हमने तुम्हारे लिए यह किया, इसलिए तुम हमें कुछ दो।
इसी मंच पर कहा गया कि भारत अपने योगदान का श्रेय नहीं मांगता। यह बात भारत की पुरानी परंपरा को दर्शाती है। हमारे यहां कहा गया है कि नेकी कर दरिया में डाल, यानी अच्छा काम करके भूल जाओ। यही संस्कृति आज विदेश नीति में भी दिखाई देती है।
जब कोविड महामारी आई थी, तब कई बड़े देशों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए थे, लेकिन भारत ने सौ से अधिक देशों को टीके और दवाएं भेजीं। उस समय यह मदद किसी सौदे के तहत नहीं थी, बल्कि इसके पीछे यह सोच थी कि संकट में सबको साथ रहना चाहिए।
मंच पर तकनीक को लेकर भी एक महत्वपूर्ण बात कही गई कि तकनीक का उपयोग लोगों को सशक्त बनाने के लिए होना चाहिए, न कि उन्हें नियंत्रित करने के लिए। भारत में इसका उदाहरण साफ दिखाई देता है। सस्ते डेटा ने पूरे देश को बदल दिया है। इसकी वजह से गांव का बच्चा भी ऑनलाइन पढ़ रहा है और छोटी दुकान भी ऑनलाइन भुगतान स्वीकार कर रही है। ठेले वाले से लेकर बड़े शोरूम तक, सभी एक ही डिजिटल व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं। यह दुनिया के लिए एक नया मॉडल है, जहां तकनीक केवल अमीरों के लिए नहीं, बल्कि सबके लिए है।
डेटा, ज्ञान और नवाचार को आज की ताकत बताया गया है और यह सही भी है। आने वाला समय उसी का होगा, जिसके पास ज्ञान और तकनीक होगी। लेकिन भारत ने यह भी दिखाया है कि ज्ञान बांटने से ही बढ़ता है।
भारत के लोकतंत्र की चर्चा भी इस मंच पर हुई। कहा गया कि सौ से अधिक भाषाएं, खुली बहस और अलग-अलग विचार भारत की ताकत हैं। दुनिया में कई जगह लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित है, लेकिन भारत में लोकतंत्र रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देता है। लोग खुलकर बोलते हैं, बहस करते हैं और असहमत होते हैं, फिर भी साथ रहते हैं। यही विविधता भारत को एक स्थिर और भरोसेमंद भागीदार बनाती है।
पिछले दस वर्षों में पच्चीस करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर आने की बात भी कही गई। यदि यह आंकड़ा सही है, तो यह एक बड़ी उपलब्धि है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का गरीबी से बाहर आना केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं होता, बल्कि इसके लिए पूरी अर्थव्यवस्था में बदलाव लाना पड़ता है। 7.8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि और सात सौ अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार भारत की मजबूती को दर्शाता है। साथ ही, हरित ऊर्जा में तेजी से बढ़ता निवेश बताता है कि भारत केवल आज के बारे में नहीं, बल्कि आने वाले कल के बारे में भी सोच रहा है।
भारत पहली बार इस बड़े आर्थिक मंच की मेजबानी कर रहा है। यह अपने आप में संकेत है कि दुनिया की आर्थिक बहस का केंद्र बदल रहा है। पहले ऐसी बहसें मुख्य रूप से पश्चिमी देशों में होती थीं, लेकिन अब दुनिया मान रही है कि भविष्य की कहानी एशिया में लिखी जाएगी और उसमें भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
यह मंच केवल भाषणों के लिए नहीं है, बल्कि दुनिया के बड़े निवेशकों, नीति निर्माताओं और विचारकों को एक साथ लाता है। वहां भारत का यह कहना कि हम दुनिया के लिए आगे बढ़ रहे हैं, वैश्वीकरण की एक नई सोच प्रस्तुत करता है। आज दुनिया युद्ध, जलवायु परिवर्तन और गरीबी जैसी चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे में हर देश केवल अपने बारे में सोचेगा, तो कोई भी संकट हल नहीं होगा। भारत का संदेश यही है कि तरक्की का मतलब सबको साथ लेकर चलना है।
दवाएं, प्रतिभा और तकनीक देकर भारत ने दुनिया की मदद की है। बिना श्रेय मांगे मदद करना ही सबसे बड़ी मदद होती है। यही कारण है कि दुनिया भारत की ओर उम्मीद से देख रही है, क्योंकि भारत केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक भरोसा है।














