नई दिल्ली, 17 अक्टूबर।
थोक महंगाई का आंकड़ा जब तीस महीने के शिखर पर पहुंचता है, तो वह केवल सांख्यिकी नहीं रह जाता, बल्कि बाजार के मनोविज्ञान को भी बदल देता है। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार की अस्थिरता और आपूर्ति शृंखला में बाधाओं का सीधा असर भारतीय थोक बाजार पर दिख रहा है। थोक महंगाई बढ़ना इस बात का संकेत है कि उत्पादन की लागत बढ़ रही है और इसका असर अंततः खुदरा बाजार तक पहुंचेगा।
ईंधन, बिजली और थोक महंगाई का गहरा संबंध है। जब बिजली और ईंधन महंगे होते हैं, तो केवल घरेलू बिल नहीं बढ़ते, बल्कि कारखानों में बनने वाला हर सामान महंगा हो जाता है। परिवहन का खर्च बढ़ता है, कोल्ड स्टोरेज महंगा होता है और इसका असर खाद्य उत्पादों से लेकर औद्योगिक वस्तुओं तक दिखाई देता है। यही कारण है कि विभिन्न श्रेणियों में कीमतों का दबाव बढ़ रहा है।
शेयर बाजार भी इस स्थिति से प्रभावित होता है। निवेशकों को आशंका है कि कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ने के बावजूद वे पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पाएंगी। इससे मुनाफा घट सकता है और बिकवाली बढ़ सकती है। वैश्विक उथल-पुथल के बीच विदेशी निवेशकों की निकासी रुपये पर दबाव और बाजार में अस्थिरता बढ़ा सकती है।
केंद्र सरकार के सामने चुनौती महंगाई पर नियंत्रण के साथ आर्थिक गतिविधियों को गति देने की भी है। ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक स्रोतों और रणनीतिक भंडार पर काम करना होगा। खाद्य आपूर्ति बेहतर बनाने, किसानों की मंडियों तक सीधी पहुंच सुनिश्चित करने और जमाखोरी पर सख्त नियंत्रण से कीमतों को काबू में रखने में मदद मिल सकती है। केवल ब्याज दरें बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उत्पादन बढ़ाने और लागत घटाने पर भी ध्यान देना होगा।
महंगाई का यह दौर वैश्विक कारणों से शुरू हुआ है, लेकिन इसका समाधान घरेलू स्तर पर भी खोजना होगा। यदि थोक स्तर पर कीमतों का दबाव नहीं थमा, तो उसका असर खुदरा बाजार और आम आदमी की रसोई तक पहुंचेगा। सरकार को आपूर्ति बढ़ाने और उत्पादन लागत घटाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। तभी बाजार में स्थिरता और उपभोक्ताओं को राहत मिल सकेगी।













