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संपादकीय
17 Oct, 2026

एसआईआर पर आयोग बैकफुट पर, तीस दिन में पाँच आदेश बदले

एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 30 दिनों में पांच आदेशों में संशोधन से निर्वाचन आयोग की तैयारियों, पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों को लेकर बहस तेज हुई है।

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर।

भारत निर्वाचन आयोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव है। उसकी हर प्रक्रिया पर करोड़ों आँखें टिकी रहती हैं। जब वह विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर जैसी प्रक्रिया शुरू करता है, तो उसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना होता है। लेकिन पिछले तीस दिनों में पाँच बड़े आदेशों में बदलाव ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। क्या आयोग किसी दबाव में है या जमीन पर आ रही कठिनाइयों को देखकर अपनी प्रक्रिया में सुधार कर रहा है? इस घटनाक्रम के लोकतांत्रिक संदेश को समझना जरूरी है।

एसआईआर की शुरुआत पश्चिम बंगाल से हुई और वहीं से विवाद भी शुरू हुआ। छूटे हुए पात्र मतदाताओं को जोड़ने के लिए विशेष शिविर लगाए गए और चौबीस जिलों में अभियान शुरू किया गया। इसी बीच फार्म छह के साथ अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ने का आदेश आया, जिसमें पुरानी मतदाता सूची और परिवार के सदस्यों के नाम से संबंधित जानकारी मांगी गई। इस पर सर्वोच्च न्यायालय को स्पष्ट करना पड़ा कि उसने फार्म छह के संशोधित रूप को मंजूरी नहीं दी है।

फार्म सात का उपयोग किसी मतदाता का नाम हटाने या उस पर आपत्ति दर्ज करने के लिए होता है। इसके दुरुपयोग की शिकायतों के बीच एक ही व्यक्ति द्वारा सैकड़ों नाम हटाने के आवेदन किए जा रहे थे। आयोग ने सीमा तय की कि एसआईआर के दौरान एक मतदाता अधिकतम दस फार्म सात जमा कर सकेगा। सामान्य दिनों में यह सीमा पाँच रहेगी। यह सुधार जरूरी था, क्योंकि लोकतंत्र में नाम जोड़ना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखना है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव नोटिस पाने वाले मतदाताओं की सुनवाई से जुड़ा है। पहले नोटिस मिलने पर मतदाता को स्वयं कार्यालय पहुंचना पड़ता था। बुजुर्गों, महिलाओं और रोज कमाकर खाने वाले लोगों के लिए यह कठिन था। अब बूथ स्तरीय अधिकारी यानी बीएलओ घर जाकर दस्तावेज जुटाएंगे और उन्हें निर्वाचन आयोग के पोर्टल पर अपलोड करेंगे। यह बदलाव जमीनी कठिनाइयों को समझने का संकेत है।

तीस दिनों में पाँच आदेश बदलना प्रशासनिक कमजोरी नहीं, संवेदनशीलता का प्रमाण भी हो सकता है। आयोग ने माना है कि पात्र मतदाता सूची से बाहर नहीं रहने चाहिए। लेकिन जब कोई संस्था बार-बार अपने आदेश बदलती है, तो जनता में भ्रम पैदा होता है। विपक्ष प्रक्रिया की तैयारी पर सवाल उठाता है और सत्तापक्ष इसे विपक्ष के दबाव में झुकना बताता है। दोनों ही स्थितियां आयोग की निष्पक्ष छवि के लिए ठीक नहीं हैं।

फार्म छह के साथ अतिरिक्त घोषणा-पत्र का विवाद सबसे बड़ा सबक है। आयोग ने पहले अतिरिक्त जानकारी मांगी और विवाद होने पर उसे वापस लेना पड़ा। इससे सवाल उठता है कि क्या नीति बनाने से पहले जमीनी परीक्षण किया गया था? नई जानकारी मांगने से पहले यह सोचना जरूरी है कि क्या वह पहले से अन्य दस्तावेजों में उपलब्ध है और क्या गरीब मतदाता के लिए अपने दादा के जन्म का प्रमाण देना संभव है।

हमारा आग्रह है कि आयोग बैकफुट पर नहीं, फ्रंटफुट पर दिखे। एसआईआर जैसी बड़ी प्रक्रिया से पहले मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की बैठक केवल औपचारिकता न हो। बीएलओ द्वारा घर जाकर दस्तावेज जुटाने की पहल स्थायी बनाई जाए। फार्म छह और फार्म सात की प्रक्रिया पारदर्शी हो, ताकि किसी का नाम बिना सुनवाई के न हटे।

मतदाता सूची केवल कागज नहीं, लोकतंत्र का आधार है। एक भी पात्र व्यक्ति का नाम छूटना या अपात्र व्यक्ति का नाम जुड़ना, दोनों लोकतंत्र के लिए खतरा हैं। आयोग ने तीस दिनों में पाँच बार आदेश बदले हैं। यह प्रमाण है कि वह सुन रहा है। अब जरूरत है कि वह सुनने के साथ दूरदर्शिता भी दिखाए, ताकि उसे अपने आदेश बार-बार न बदलने पड़ें।

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