नई दिल्ली, 19 अक्टूबर।
संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हुआ था, लेकिन उसका सत्रावसान अब तक नहीं किया गया है। इसी सत्र के दौरान विशेष बैठक बुलाकर परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक लाने की चर्चा है। सवाल है कि क्या इतने बड़े संवैधानिक फैसले जल्दबाजी में होने चाहिए या इन पर देशव्यापी बहस जरूरी है?
संविधान संशोधन के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होता है। सरकार संख्या बल को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रही है। चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसदों और छोटे विपक्षी दलों से भी संपर्क किया जा रहा है। परिसीमन का विरोध करने वाले डीएमके जैसे दलों से बातचीत कई सवाल खड़े करती है।
परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने का मामला नहीं, बल्कि संघीय संतुलन का प्रश्न है। दक्षिण के राज्यों ने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास किए हैं। यदि नए निर्वाचन क्षेत्र केवल जनसंख्या के आधार पर तय होते हैं, तो इन राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। इससे उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक असंतुलन बढ़ने की आशंका है।
महिला आरक्षण विधेयक पारित हो चुका है, लेकिन जनगणना और परिसीमन से जुड़ी शर्तों के कारण लागू नहीं हो पाया है। अब सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत वृद्धि की चर्चा है। महिला आरक्षण को वास्तविक प्रतिनिधित्व का माध्यम बनाना जरूरी है, न कि राजनीतिक लाभ का साधन।
परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विधेयक को अंतिम समय तक गोपनीय रखना उचित नहीं है। सांसदों और जनता को प्रस्ताव समझने तथा चर्चा करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सर्वदलीय बैठक की मांग की है।
विशेष सत्र बुलाना सरकार का अधिकार है, लेकिन परिसीमन का समाधान संख्या बल से नहीं, व्यापक सहमति से निकलना चाहिए। जनसंख्या के साथ विकास और संघीय संतुलन को महत्व देना जरूरी है। यह सत्र टकराव का नहीं, संवाद का अवसर बनना चाहिए।













