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संपादकीय
19 Oct, 2026

भारत के तीरंदाजी चैंपियनों की कहानी: अमरावती और सतारा से एशियाई खेलों तक

कुमकुम मोहोड़, पृथिका प्रदीप और साहिल जाधव की सफलता पारिवारिक त्याग, अनुशासन और संस्थागत सहयोग के महत्व को उजागर करती है।

भोपाल, 19 अक्टूबर।

महाराष्ट्र के अमरावती की कुमकुम मोहोड़ ने जब तीरंदाजी शुरू की, तब खेल उपकरणों का खर्च उठाना भी उनके परिवार के लिए चुनौती था। उनके पिता अनिल मोहोड़ ने पहली बार तीरंदाजी के जूते 400 रुपये में खरीदे थे। पारंपरिक लकड़ी के धनुष से रिकर्व धनुष अपनाने के बाद जूतों की अगली जोड़ी पर 1,600 रुपये खर्च करने पड़े। आज 17 वर्ष की उम्र में कुमकुम के पास जूतों की दस जोड़ियां और तीन धनुष हैं। प्रायोजक भी उनमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं। उनका सफर संघर्ष, त्याग और दृढ़ संकल्प की मिसाल है।

कोविड महामारी के दौरान एक बार कुमकुम इस चिंता में रोने लगीं कि पैसे की कमी के कारण नए तीर नहीं खरीद पाने से उनका प्रदर्शन प्रभावित हो रहा है। अगले ही दिन उनके पिता ने 15 हजार रुपये के तीर खरीदकर दिए और वादा किया कि अब उन्हें तीरों की कमी नहीं होने देंगे। बेटी के सपनों को पूरा करने के लिए दस साल की बचत लगाने के बाद उन्होंने अपना मिठाई के डिब्बे बनाने का कारोबार भी बेच दिया। वह कहते हैं, “कुमकुम की मां का सपना था कि वह तीरंदाज बने। मैं अपनी जिंदगी की दो सबसे अहम महिलाओं को कैसे निराश कर सकता था?”

पुणे जिले के पिंपरी की 18 वर्षीय पृथिका प्रदीप का सफर पांचवीं कक्षा में स्कूल की एक गतिविधि से शुरू हुआ। तीरंदाजी में रुचि बढ़ने पर उन्होंने पेशेवर प्रशिक्षण लेना शुरू किया। आज वह कोच कुणाल तावड़े के मार्गदर्शन में पिंपले गुरव स्थित तीरंदाजी केंद्र में अभ्यास करती हैं। माता-पिता प्रिया और प्रदीप के सहयोग से उन्होंने पढ़ाई और कठिन प्रशिक्षण के बीच संतुलन बनाए रखा। उनकी मेहनत का परिणाम 2026 के एशियाई खेलों में भारत के लिए जीते गए स्वर्ण पदक के रूप में सामने आया।

सतारा के 25 वर्षीय साहिल जाधव के लिए तीरंदाजी जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। कोच प्रवीण सावंत के मार्गदर्शन में उन्होंने अनुशासन, शारीरिक फिटनेस और निरंतर सुधार को अपने करियर का आधार बनाया है। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनके माता-पिता ने प्रशिक्षण, उपकरण और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया। साहिल के अनुसार, भारतीय टीम की जर्सी पहनने का अर्थ अपने सपनों के साथ माता-पिता के सपनों को भी आगे बढ़ाना है। तीरंदाजी में धैर्य और मानसिक मजबूती बेहद जरूरी हैं, क्योंकि छोटी-सी गलती भी मुकाबले का परिणाम बदल सकती है।

इन खिलाड़ियों की कहानियां पारिवारिक त्याग, प्रतिभा को कम उम्र में निखारने और अंतरराष्ट्रीय सफलता के लिए आवश्यक अनुशासन का महत्व बताती हैं। खिलाड़ियों की मेहनत के साथ संस्थागत सहयोग भी जरूरी है।

एनटीपीसी वर्ष 2018 से अपनी कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के तहत भारतीय तीरंदाजी को सहयोग दे रही है। राष्ट्रीय खेल विकास कोष (एनएसडीएफ), भारतीय खेल प्राधिकरण (एसएआई) और भारतीय तीरंदाजी संघ (एएआई) के माध्यम से 152.88 करोड़ रुपये की सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई गई है। इसमें प्रतिभाओं की पहचान, प्रशिक्षण, उपकरण, छात्रवृत्ति, अकादमियों और प्रतियोगिताओं में भागीदारी के अवसर शामिल हैं।

‘धनुर्विद्या प्रोजेक्ट’ इसी प्रयास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण और अवसर देकर उच्चस्तरीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचाना है। इसमें महिला खिलाड़ियों और पैरा-तीरंदाजों के लिए भी अवसर शामिल हैं।

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