भोपाल, 19 अक्टूबर।
प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि 570 से अधिक शासकीय महाविद्यालयों में करीब 7000 स्थायी सहायक प्राध्यापकों के पद खाली हैं। औसतन हर कॉलेज में 12 से अधिक शिक्षकों की कमी है। इस कमी को पिछले कई वर्षों से लगभग 4 हजार अतिथि विद्वान संभाल रहे हैं। वे पढ़ाते हैं, परीक्षाएं कराते हैं और कॉपियां जांचते हैं, लेकिन हर साल उन्हें नए सिरे से नौकरी के लिए आवेदन करना पड़ता है।
सरकार ने अब ऐसी व्यवस्था बनाई है, जिसके तहत अतिथि विद्वान को उसी कॉलेज में खाली स्थायी पद पर प्राथमिकता दी जाएगी, जहां वह पढ़ा रहा है। उसे दूरदराज के कॉलेज में नहीं भेजा जाएगा। वहीं, फिलहाल 949 पदों पर नई भर्ती की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसमें हिंदी, अंग्रेजी, वाणिज्य, इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान, भौतिकी और रसायन विज्ञान जैसे प्रमुख विषय शामिल हैं। ये कदम राहत देने वाले हैं, लेकिन प्रदेश की जरूरतों के लिहाज से पर्याप्त नहीं हैं।
7000 पदों का खाली होना केवल प्रशासनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। जब कॉलेजों में स्थायी शिक्षक ही नहीं होंगे, तो शोध, सेमिनार और नई शिक्षा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन कैसे होगा? राष्ट्रीय मूल्यांकन के दौरान नियमित फैकल्टी की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। शिक्षकों की कमी से कॉलेजों की ग्रेडिंग प्रभावित होती है, अच्छे विद्यार्थी प्रवेश लेने से कतराते हैं और कंपनियों की प्लेसमेंट में रुचि भी घट सकती है। इस तरह शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर है। कई कॉलेजों में विज्ञान प्रयोगशालाएं हैं, लेकिन प्रयोग कराने के लिए स्थायी शिक्षक नहीं हैं। कहीं एक ही अतिथि विद्वान को तीन-तीन विषय पढ़ाने पड़ते हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को विषय विशेषज्ञों से नियमित मार्गदर्शन नहीं मिल पाता।
अतिथि विद्वान की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। उसे प्रति पीरियड के हिसाब से भुगतान मिलता है और इसकी अधिकतम सीमा तय होती है। गर्मी की छुट्टियों में दो महीने तक वेतन नहीं मिलता। न मेडिकल सुविधा है, न भविष्य निधि जैसी सामाजिक सुरक्षा। इसके बावजूद वह स्थायी प्राध्यापक की तरह कक्षाएं लेने, प्रवेश प्रक्रिया संभालने और परीक्षा ड्यूटी निभाने जैसे काम करता है। अस्थायी कमी दूर करने के लिए शुरू हुई व्यवस्था पिछले 15 वर्षों से लगभग स्थायी विकल्प बन गई है।
कई अतिथि विद्वानों की उम्र 45 वर्ष से अधिक हो चुकी है। उन्होंने अपनी जवानी शिक्षण कार्य में लगा दी, लेकिन नौकरी की सुरक्षा नहीं मिली। इस उम्र में उन्हें हटाया जाता है, तो दूसरी नौकरी पाना कठिन हो सकता है। उनके अनुभव और योग्यता को नजरअंदाज करना न केवल उनके साथ अन्याय होगा, बल्कि उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह होगा।
अतिथि विद्वानों को वर्तमान पदस्थापना के नजदीक खाली पदों पर प्राथमिकता देने का फैसला स्वागत योग्य है। पहले राजधानी में पढ़ाने वाले अतिथि विद्वानों को सैकड़ों किलोमीटर दूर के कॉलेजों में जाना पड़ता था। इससे विशेषकर महिला शिक्षकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। नजदीक पदस्थापना से उन्हें राहत मिल सकती है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। असली जरूरत नियमित भर्ती में तेजी लाने की है। 949 पदों की भर्ती से 7000 पदों की कमी पूरी नहीं होगी। भर्ती प्रक्रिया में विज्ञापन से नियुक्ति तक वर्षों लग जाना भी बड़ी समस्या है। कई बार न्यायिक प्रक्रियाओं के कारण नियुक्तियां अटक जाती हैं और विद्यार्थी लंबे समय तक स्थायी शिक्षकों से वंचित रहते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में नए कॉलेज खोलने पर जोर दिया गया है। नए संस्थान खोलना उपयोगी है, लेकिन बिना शिक्षकों के कॉलेज खोलना बिना डॉक्टर के अस्पताल चलाने जैसा है। किसी महाविद्यालय की पहचान उसकी इमारत से नहीं, बल्कि वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों से होती है। स्थायी शिक्षक पढ़ाने के साथ शोध करता है, परियोजनाओं पर काम कराता है और विद्यार्थियों को करियर की दिशा दिखाता है। नौकरी की असुरक्षा से जूझ रहे अतिथि विद्वानों के लिए दीर्घकालिक शोध और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करना कठिन हो सकता है।
समाधान के लिए सबसे पहले नियमित भर्ती का वार्षिक कैलेंडर घोषित किया जाना चाहिए। हर साल कम से कम 1500 से 2000 पदों पर भर्ती का लक्ष्य तय हो और समयसीमा का पालन सुनिश्चित किया जाए। लंबे समय से पढ़ा रहे योग्य अतिथि विद्वानों के अनुभव को भर्ती प्रक्रिया में नियमानुसार उचित महत्व दिया जाना चाहिए। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षकों को बनाए रखने के लिए विशेष भत्ता, आवास और बच्चों की शिक्षा जैसी सुविधाएं भी दी जा सकती हैं।
तकनीक का उपयोग भी शिक्षकों की कमी के प्रभाव को कम कर सकता है। विषय विशेषज्ञों के व्याख्यान रिकॉर्ड कर विभिन्न कॉलेजों में उपलब्ध कराए जाएं, ताकि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री मिल सके। हालांकि, तकनीक स्थायी शिक्षकों का विकल्प नहीं बन सकती। विद्यार्थियों को नियमित मार्गदर्शन और संवाद के लिए योग्य शिक्षक चाहिए।
अतिथि विद्वानों को राहत देना जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि उच्च शिक्षा आखिर कब तक अतिथि व्यवस्था के भरोसे चलेगी? 7000 खाली पद बताते हैं कि भवन बनाने के साथ उनमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था करना भी उतना ही जरूरी है। प्रदेश को ज्ञान का केंद्र बनाना है, तो स्थायी, योग्य और समर्पित शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करनी होगी। तभी महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को केवल कक्षाएं नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की दिशा भी मिल सकेगी।














