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संपादकीय
21 Oct, 2026

हमारे बीच बसी रावण रूपी बुराइयों को जलाना होगा: दशहरा केवल परंपरा नहीं, आत्मा की शुद्धि का पर्व

दशहरा हमें महिलाओं के सम्मान, बच्चों की सुरक्षा, नशामुक्ति और सामाजिक सद्भाव के लिए प्रयास करते हुए अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करने की प्रेरणा देता है।

भोपाल, 21 अक्टूबर।

दशहरा हर वर्ष आता है और हमें याद दिलाता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, उसका अंत निश्चित है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके यह प्रमाणित किया था कि सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। विजय अंत में सत्य की ही होती है।

लेकिन आज प्रश्न यह है कि क्या हमने इस संदेश को केवल कथा तक सीमित कर दिया है? क्या हम केवल एक पुतला जलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं? यदि ऐसा है, तो हम बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं, क्योंकि रावण केवल लंका में नहीं था, वह आज हमारे बीच भी बसा हुआ है और अधिक खतरनाक रूप में मौजूद है।

इसलिए इस बार दशहरे का अर्थ बदलना होगा। केवल मैदान में खड़े पुतले को नहीं, बल्कि हमारे बीच बसी रावण रूपी बुराइयों को जलाना होगा। त्रेतायुग का रावण दिखाई देता था। उसका महल था, उसकी सेना थी और उसका अहंकार सामने था, लेकिन आज का रावण अदृश्य है। वह हमारे घरों, स्कूलों, कार्यालयों और मन में बैठा है।

हमारे बीच बसा पहला रावण बच्चियों के साथ होने वाले अपराधों के रूप में दिखाई देता है। जिस समाज में छोटी-छोटी बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं, उसे सभ्य कैसे कहा जा सकता है? महिलाओं पर अत्याचार, दहेज के लिए प्रताड़ना, कार्यस्थल पर शोषण, सड़क पर असुरक्षा और समाज में भेदभाव भी इसी रावण के अलग-अलग चेहरे हैं। हम नवरात्रि में शक्ति की पूजा करते हैं, लेकिन उसी शक्ति का अपमान होते हुए देखते हैं। यह पाखंड नहीं तो क्या है?

नशा भी हमारे युवाओं को निगल रहा है। युवा, जो देश का भविष्य हैं, नशे की गिरफ्त में आकर अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। नशे के कारण चोरी, लूट और हिंसा जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। जाति के नाम पर भेदभाव, धर्म के नाम पर नफरत, दहेज के कारण हत्याएं और अंधविश्वास के नाम पर शोषण जैसी बुराइयां भी समाज को भीतर से खोखला कर रही हैं।

हम हर साल रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन अगले दिन से वही सब शुरू हो जाता है, क्योंकि हमने पुतला जलाया है, प्रवृत्ति नहीं। रावण ज्ञानी, विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसका अहंकार ही उसके अंत का कारण बना। आज हमारे समाज में भी धन, पद और जाति का अहंकार बढ़ रहा है। इसलिए दशहरे पर बाहर के रावण के साथ भीतर के अहंकार को भी जलाना होगा।

अक्सर हम सोचते हैं कि सरकार कानून बनाए और पुलिस सख्ती करे, तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन यह अधूरी सच्चाई है। सरकार कानून बना सकती है और पुलिस अपराधियों को पकड़ सकती है, लेकिन अपराध की मानसिकता को बदलने में समाज की भूमिका महत्वपूर्ण है। कानून अपराध के बाद कार्रवाई करता है, जबकि जागरूक समाज अपराध रोकने में योगदान दे सकता है।

सामाजिक संगठनों की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है। उन्हें बच्चियों की सुरक्षा, महिला सम्मान, नशामुक्ति और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाने चाहिए। मोहल्लों में बाल सुरक्षा समितियां बनाई जाएं, महिलाओं को सहायता उपलब्ध कराई जाए और युवाओं को खेल, संस्कृति तथा रोजगार से जोड़ा जाए। दहेजमुक्त विवाह को प्रोत्साहित करने, सामाजिक सद्भाव बढ़ाने और वैज्ञानिक सोच विकसित करने के प्रयास भी जरूरी हैं।

रावण को मारने के लिए राम को सेना तैयार करनी पड़ी थी। आज भी बुराइयों के विरुद्ध समाज को एकजुट होना होगा। युवाओं को राम के आदर्शों पर चलने और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का संकल्प लेना होगा।

दशहरा केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि बुराई समाप्त करने का संकल्प है। इस बार रावण का पुतला जलाते समय बच्चियों के विरुद्ध अपराध करने वाली मानसिकता, महिलाओं का अपमान करने वाली सोच, नशे के कारोबार और सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने का संकल्प भी लें। यही सच्चा दशहरा होगा, यही राम के आदर्शों का पालन और यही बुराई पर अच्छाई की वास्तविक विजय होगी।

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