भोपाल, 21 अक्टूबर।
दशहरा केवल रावण का पुतला जलाने का दिन नहीं, बल्कि इस शाश्वत सत्य को याद करने का अवसर है कि अंततः विजय सत्य और अच्छाई की ही होती है। भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके सिद्ध किया था कि ज्ञान और शक्ति के बावजूद अहंकार, अन्याय और अधर्म का अंत निश्चित है। आज आवश्यकता केवल बाहर के रावण को जलाने की नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपी बुराइयों को पहचानने की भी है।
त्रेतायुग का रावण दस सिर वाला था, लेकिन आज का रावण अनेक रूपों में हमारे सामने है। कभी बच्चियों के साथ अपराध, कभी महिलाओं पर अत्याचार, कभी दहेज प्रथा, तो कभी भ्रष्टाचार, नशे और जाति-धर्म के नाम पर फैलाई जाने वाली नफरत के रूप में। आज का रावण हमारे घरों, विद्यालयों, कार्यालयों और समाज के साथ हमारे मन में भी छिपा है।
बच्चियों के साथ होने वाले अपराध किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक हैं। भगवान श्रीराम ने माता सीता के अपहरण के विरुद्ध संघर्ष किया था, लेकिन आज भी महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। केवल कठोर कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। उनका प्रभावी क्रियान्वयन, त्वरित न्याय और परिवारों में अच्छे संस्कार भी जरूरी हैं। महिलाओं को देवी कहकर पूजने के बजाय उन्हें समान अधिकार, सम्मान और सुरक्षा देना होगा।
नशा भी आधुनिक समाज का एक बड़ा रावण है। शराब और मादक पदार्थ युवाओं के भविष्य के साथ परिवारों को भी बर्बाद कर रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए पुलिस कार्रवाई के साथ सामाजिक जागरूकता, खेल, शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे, ताकि युवा सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ सकें।
दहेज प्रथा, जातिगत भेदभाव, बाल विवाह और अंधविश्वास जैसी कुरीतियां भी समाज की प्रगति में बाधक हैं। भगवान श्रीराम के जीवन से समरसता और मानवीय सम्मान की प्रेरणा मिलती है। जब हम मनुष्य की पहचान उसके जन्म के बजाय कर्म से करेंगे, तभी सामाजिक भेदभाव की दीवारें कमजोर होंगी।
बुराइयों को समाप्त करने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। कानून व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है, लेकिन सामाजिक सोच बदलने में प्रत्येक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है। माता-पिता बच्चों को संस्कार दें, शिक्षक नैतिकता सिखाएं और नागरिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएं। समाज की चुप्पी कई बार बुराई को बढ़ने का अवसर देती है।
दशहरा हमें सिखाता है कि सत्य की विजय के लिए संघर्ष आवश्यक है। इस पर्व पर अहंकार, लालच, क्रोध, हिंसा और अन्याय को त्यागने का संकल्प लेना चाहिए। केवल लकड़ी और कागज के रावण को जलाने से समाज की बुराइयां समाप्त नहीं होंगी। जब हम अपने भीतर के रावण को मारेंगे, तभी दशहरे का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा और अच्छाई की विजय सार्थक बनेगी।













