नई दिल्ली, 21 अक्टूबर।
निस्संदेह, करियर से जुड़ी परीक्षाएं लाखों युवाओं के भविष्य का निर्धारण करती हैं। ऐसे में परीक्षाओं की पारदर्शिता, निष्पक्षता और ईमानदारी पर परीक्षार्थियों का भरोसा कायम रहना बेहद जरूरी है। हाल के दिनों में देशभर में युवा असंतोष के जो स्वर मुखर हुए, उनकी शुरुआत नीट परीक्षा प्रणाली की विफलताओं से हुई थी। देश की राजधानी दिल्ली के अलावा झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र आदि राज्यों में परीक्षा संबंधी विसंगतियों के चलते परीक्षार्थी आंदोलन करते नजर आए।
जब युवाओं के मन में अपने भविष्य को लेकर आशंकाएं पैदा हुईं, तो उनके सड़कों पर उतरने का सिलसिला तेज हुआ। प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति उपजे अविश्वास को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि को परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति का प्रमुख बनाया था। हाल ही में नीलेकणि ने परीक्षा सुधार के लिए तकनीक पर आधारित एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है, जिसे उपयोगी पहल माना जा रहा है।
दरअसल, नीलेकणि ने पेपर लीक रोकने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित नया तरीका सुझाया है। एआई का प्रयोग करके अंतिम दौर में प्रश्नपत्र तैयार करने का उनका सुझाव ऐसी व्यवस्था में सुधार का अवसर देता है, जिसे परीक्षार्थियों के भरोसे की सख्त जरूरत है। उनका तर्क है कि अंतिम समय में एक बड़े प्रश्न बैंक से पेपर तैयार करने पर प्रश्नपत्र लीक करने से जुड़े अनैतिक मुनाफे के कारोबार पर अंकुश लगाया जा सकता है।
निस्संदेह, उनके इस सुझाव और देशभर में कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली अपनाने की बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। तकनीकी नवाचार के जरिये प्रतियोगी परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसके साथ संस्थागत जवाबदेही भी जरूरी है। ग्रामीण और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इलाकों में सभी प्रतियोगी परीक्षार्थियों की पहुंच सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। आज देश में पहले से ही डेढ़ लाख टेस्टिंग सेंटर मौजूद हैं, लेकिन लाखों उम्मीदवारों के लिए सुरक्षित इंटरनेट और बिजली की उपलब्धता अब भी चुनौती है। यदि एआई की मदद से प्रश्नपत्र तैयार करने का सुझाव तार्किक है, तो उसे लागू करने की कार्ययोजना भी व्यावहारिक होनी चाहिए।
यदि परीक्षा से ठीक पहले सुरक्षित तरीके से प्रश्न चुने जाएंगे, तो परीक्षा से पहले पेपर लीक होने की आशंका कम हो सकती है। इसके बावजूद ऐसा स्वतंत्र मूल्यांकन तंत्र बनाना भी जरूरी है, जो जांच से जुड़ी गलतियों, पक्षपात और हेराफेरी को रोक सके। यानी तकनीक के साथ मानवीय निगरानी भी जरूरी होगी।
एआई का उपयोग केवल प्रश्नपत्र बनाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। शिक्षा के क्षेत्र में एआई आधारित सुधारों की उपयोगिता को व्यापक संदर्भ में समझना होगा। इसकी मदद से व्यक्तिगत शिक्षण संभव है। हर छात्र की सीखने की गति अलग होती है। कोई गणित में तेज होता है, तो कोई भाषा में कमजोर। एआई आधारित मंच छात्र की कमजोरियों को पहचानकर उसे उसी के अनुसार अभ्यास करा सकते हैं। यह ग्रामीण क्षेत्रों के उन विद्यार्थियों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, जिनके पास अच्छे शिक्षकों की उपलब्धता सीमित है। मूल्यांकन में भी एकरूपता आ सकती है। शिक्षकों द्वारा कॉपियां जांचने में थकान, पूर्वाग्रह और समय की सीमाओं का प्रभाव पड़ सकता है। एआई तेजी से मूल्यांकन में सहायता कर सकता है। इसी तरह उपस्थिति दर्ज करने और रिपोर्ट तैयार करने जैसे प्रशासनिक कार्यों का बोझ घटाकर शिक्षकों को पढ़ाने के लिए अधिक समय मिल सकता है।
हालांकि, एआई के उपयोग से जुड़ी चिंताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। भारत के कई जिलों में इंटरनेट की स्थिर उपलब्धता अब भी चुनौती है। यदि कंप्यूटर आधारित परीक्षा ही एकमात्र विकल्प बन गई, तो ग्रामीण विद्यार्थी शहरी विद्यार्थियों से पीछे रह सकते हैं। डेटा सुरक्षा भी महत्वपूर्ण प्रश्न है। एआई प्रणालियों में विद्यार्थियों का व्यक्तिगत डेटा सुरक्षित रखना होगा, ताकि उसके दुरुपयोग की आशंका न रहे। साथ ही, एआई शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकता। शिक्षा केवल सूचना नहीं, बल्कि संस्कार, संवाद और सहानुभूति भी है, जिन्हें विकसित करने में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है।
इसलिए एआई की मदद से प्रश्नपत्र तैयार करने का सुझाव तार्किक है और शिक्षा में एआई आधारित सुधार आजमाने लायक हैं, लेकिन इसका अर्थ आंख मूंदकर अनुकरण करना नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह पायलट परियोजना के रूप में कुछ जिलों में एआई आधारित प्रश्नपत्र निर्माण और कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं की शुरुआत करे। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करे, स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था बनाए और शिक्षकों को एआई का प्रशिक्षण दे।
तकनीक तभी उपयोगी है, जब वह भरोसा बढ़ाए, घटाए नहीं। पेपर लीक रोकने के लिए एआई एक औजार है, अंतिम समाधान नहीं। संस्थागत ईमानदारी, जवाबदेही और विद्यार्थियों के प्रति संवेदनशीलता के साथ यदि एआई इस समस्या के समाधान में मदद करता है, तो उसे जरूर आजमाना चाहिए।














