भोपाल, 22 अक्टूबर।
देश और दुनिया में इन दिनों युवाओं का आक्रोश सड़कों पर दिखाई दे रहा है। नारों में सत्ता बदलने की मांग है और सोशल मीडिया पर घटनाएं तेजी से फैल रही हैं। नेपाल से लेकर फ्रांस और बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका तक आंदोलनों ने सत्ताओं को चुनौती दी है। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत का संदेश महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में आंदोलन स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें समाधान का मार्ग बनना चाहिए, द्वेष और सत्ता हथियाने का औजार नहीं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक एकता के लिए जरूरी चेतावनी है।
आज विचारों और आंदोलनों का प्रभाव सीमाओं से परे पहुंचता है। एक देश में अपनाए गए तरीके दूसरे देशों में भी दोहराए जाते हैं, जबकि उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां अलग होती हैं। केवल सत्ता बदल देने से व्यवस्था नहीं बदलती। वास्तविक बदलाव के लिए निरंतर संवाद, सुधार और जनभागीदारी आवश्यक हैं। भारत के लोकतंत्र की अपनी विशेषताएं हैं, इसलिए समस्याओं के समाधान भी देश की परिस्थितियों के अनुरूप खोजने होंगे।
लोकतंत्र में आंदोलन की भूमिका महत्वपूर्ण है। जब संसद में जनता की आवाज नहीं सुनी जाती और प्रशासन समस्याओं की अनदेखी करता है, तब लोग सड़कों पर उतरते हैं। यही जनभागीदारी लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन आंदोलन की सार्थकता तभी है, जब उसका उद्देश्य समस्याओं का समाधान हो। यदि वह केवल विरोधियों को शत्रु साबित करने या सरकार गिराने का माध्यम बन जाए, तो सामाजिक विभाजन और द्वेष बढ़ने का खतरा रहता है। आंदोलन समाज को जोड़ने वाला होना चाहिए, तोड़ने वाला नहीं।
आज युवाओं का आक्रोश बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, आवास की बढ़ती लागत और भविष्य की अनिश्चितता जैसे वास्तविक कारणों से जुड़ा है। उनकी समस्याओं को सुनना और समाधान निकालना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस आक्रोश को भड़काना उचित नहीं है। युवाओं को किसी सत्ता संघर्ष का मोहरा बनाने के बजाय उनकी ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देना जरूरी है।
यह धारणा भी गलत है कि हर समस्या का समाधान सत्ता परिवर्तन में छिपा है। इतिहास बताता है कि सरकारें बदलने के बाद भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और असमानता जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं। इसलिए आंदोलनों का उद्देश्य व्यवस्था को जवाबदेह बनाना और सुधारों के लिए दबाव पैदा करना होना चाहिए।
डिजिटल युग में आंदोलनों का स्वरूप तेजी से बदला है। सोशल मीडिया के माध्यम से जनआक्रोश कुछ ही घंटों में व्यापक रूप ले सकता है। ऐसे में भ्रामक सूचनाओं और राजनीतिक दुष्प्रचार से सावधान रहना जरूरी है। युवाओं में विवेकपूर्ण सोच विकसित करने में परिवार, समाज, शैक्षणिक संस्थानों और सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है।
राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। सत्ता पक्ष को जनता की शिकायतें सुननी चाहिए और विपक्ष को रचनात्मक विरोध की भूमिका निभानी चाहिए। आंदोलन को भड़काकर राजनीतिक लाभ लेना लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है। लोकतंत्र में सत्ता का निर्णय चुनाव के माध्यम से जनता करती है। शांतिपूर्ण विरोध और जनआंदोलन भी लोकतांत्रिक अधिकार हैं, लेकिन हिंसा और दबाव के जरिए सत्ता हासिल करने की कोशिश व्यवस्था को कमजोर करती है।
आंदोलन लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। जरूरत ऐसे आंदोलनों की है, जो शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों पर सरकार को जवाबदेह बनाएं। आंदोलन का लक्ष्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, जनहित में बदलाव लाना होना चाहिए। जब विरोध संवाद का माध्यम बनेगा और आक्रोश समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगा, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा और समाज की एकता कायम रहेगी।













