भोपाल, 23 अक्टूबर।
बच्चों को सोशल मीडिया और एआई चैटबॉट के खतरों से बचाने के लिए ऑस्ट्रेलिया दुनिया के देशों को एकजुट कर गठबंधन बनाने जा रहा है। यह केवल एक देश की नीति नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि तकनीक बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
ऑस्ट्रेलिया की संचार मंत्री एनिका वेल्स ने बताया है कि मलेशिया, फिलीपींस, न्यूजीलैंड, कनाडा, स्वीडन और ब्रिटेन समेत कई देशों से चर्चा हो चुकी है। जल्द ही अन्य देशों से भी चर्चा की जाएगी। प्रस्ताव के तहत सभी देश ऑनलाइन सुरक्षा के न्यूनतम साझा मानक तय करेंगे और कंपनियों को उनका पालन करने के लिए बाध्य करेंगे।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब तक हर देश अपने स्तर पर कानून बनाता रहा है, जबकि तकनीक कंपनियां वैश्विक हैं और उनका प्रभाव सीमाओं से परे है। ऐसे में किसी एक देश का कानून पर्याप्त नहीं है। वैश्विक गठबंधन ही इस चुनौती का व्यापक समाधान दे सकता है।
आज का बच्चा जन्म से ही डिजिटल दुनिया में है। उसके हाथ में मोबाइल है और मोबाइल में पूरी दुनिया। लेकिन इसी दुनिया में कई अदृश्य खतरे भी हैं। हिंसा और अश्लील सामग्री बच्चों की मानसिक उम्र के लिहाज से अनुपयुक्त है। साइबर बुलीइंग के तहत बच्चे एक-दूसरे को ऑनलाइन परेशान करते हैं, धमकाते हैं और अपमानित करते हैं। इससे उनमें अवसाद और आत्महत्या तक की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। एआई तकनीक से बच्चों की तस्वीरों और वीडियो का दुरुपयोग भी संभव हो गया है। वहीं, अकेलेपन में एआई चैटबॉट से बातचीत करने वाले बच्चों को कई बार गलत सलाह मिलने का खतरा रहता है।
सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी तय करना इसलिए जरूरी है। मेटा, गूगल और टिकटॉक जैसी कंपनियां अब तक यह तर्क देती रही हैं कि वे केवल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती हैं और सामग्री की जिम्मेदारी उपयोगकर्ता की है। लेकिन यह तर्क अब पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रस्ताव के तहत सोशल मीडिया, एआई चैटबॉट, ऑनलाइन गेम और अन्य तकनीकी कंपनियों को अपने उत्पादों में ही सुरक्षा उपाय शामिल करने होंगे। उन्हें हर साल जोखिम का आकलन कर खतरों को कम करने के उपाय अपनाने होंगे।
ऑस्ट्रेलिया सरकार प्रस्तावित कानून को 2026 के अंत तक संसद से पारित कराना चाहती है। उल्लंघन पर कंपनियों को 726 करोड़ रुपये तक का जुर्माना देना पड़ सकता है। यह केवल आर्थिक दंड नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा से समझौता न करने का कड़ा संदेश है। इससे अन्य देशों में भी कंपनियों पर जवाबदेही का दबाव बढ़ सकता है।
प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण पहलू कंटेंट सुझाने वाले एल्गोरिदम को बंद करने का विकल्प देना है। अभी प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं की पसंद और गतिविधियों के आधार पर सामग्री दिखाते हैं। इससे बच्चे घंटों स्क्रॉल करते रहते हैं और डिजिटल लत का शिकार हो सकते हैं। एल्गोरिदम पर नियंत्रण का विकल्प इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है।
ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू किया था। इसके बाद कई देशों में भी ऐसे प्रतिबंधों पर चर्चा और कानूनी पहल शुरू हुई। यह बताता है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा अब वैश्विक चिंता बन चुकी है।
भारत में भी करोड़ों बच्चे सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम का उपयोग करते हैं। साइबर बुलीइंग, गेमिंग की लत और अश्लील सामग्री से जुड़े खतरे यहां भी गंभीर हैं। ऐसे में भारत के लिए इस वैश्विक गठबंधन में सक्रिय भूमिका निभाना लाभकारी होगा। देश में सूचना प्रौद्योगिकी नियम लागू हैं, लेकिन बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए विशेष उपायों की जरूरत है।
केवल प्रतिबंध से समस्या हल नहीं होगी। बच्चों को डिजिटल दुनिया का सुरक्षित उपयोग सिखाना भी जरूरी है। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, माता-पिता को जागरूक किया जाना चाहिए और तकनीकी कंपनियों को भारतीय भाषाओं में सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने के लिए बाध्य करना चाहिए। एआई चैटबॉट के लिए भी स्पष्ट नियम होने चाहिए कि वे बच्चों से किस तरह बातचीत कर सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया की यह पहल बताती है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा किसी एक देश या परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है। तकनीक ने दुनिया को जोड़ा है, लेकिन नए खतरे भी पैदा किए हैं। यदि देश मिलकर सुरक्षा मानक तय करें और कंपनियों को जवाबदेह बनाएं, तो यह डिजिटल युग की बड़ी उपलब्धि होगी। बच्चे ही भविष्य हैं। यदि भविष्य को ऑनलाइन खतरों से नहीं बचाया गया, तो विकास का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इसलिए इस गठबंधन का स्वागत किया जाना चाहिए और भारत को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।














