नई दिल्ली, 23 अक्टूबर।
दुनिया के कई देशों में इस समय उग्र आंदोलनों का दौर चल रहा है। बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन तक की नौबत आ गई। फ्रांस और यूरोप के कुछ देशों में भी जनाक्रोश सड़कों पर दिखाई दे रहा है। इन आंदोलनों की प्रकृति अलग-अलग है, लेकिन एक समानता यह है कि ये मौजूदा व्यवस्था के प्रति असंतोष से पैदा हुए हैं।
भारत में इस समय आंदोलनकारी एक तरह से छुट्टी मना रहे हैं, लेकिन सरकार के विरोध में लंबी योजना पहले से घोषित की गई है। संसदीय व्यवस्था में विपक्ष का काम सरकार का विरोध करना भी है। यह विरोध लोकतंत्र को जीवंत बनाता है, लेकिन सवाल यह है कि विरोध की सीमा क्या होनी चाहिए और उसका उद्देश्य क्या होना चाहिए।
बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में आंदोलनों के जरिए रिजीम चेंज का जो नारा लगा, वही नारा अब भारत में भी गूंजने लगा है। यह नारा केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि बलपूर्वक तख्तापलट का संकेत देता है। राजनीतिक दल सरकार का विरोध कर ही रहे हैं, लेकिन अब कॉकरोच जनता पार्टी, वामपंथी छात्र संगठन और सिविल सोसाइटी जैसे समूह भी राजनीतिक दलों के साथ जुड़ते दिखाई दे रहे हैं।
आईशा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा वोरा और सुप्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण के रिजीम चेंज संबंधी बयानों ने आंदोलन की दिशा को लेकर सवाल खड़े किए हैं। नेहा वोरा बांग्लादेश के तख्तापलट आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कर रही हैं, तो प्रशांत भूषण इस आंदोलन का उद्देश्य सीधे रिजीम चेंज बता रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह आंदोलन केवल चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ है या इसके पीछे व्यापक राजनीतिक बदलाव का उद्देश्य भी है।
भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे आंदोलन को अराजकता फैलाने वाला बताती रही है। अब जब इसमें रिजीम चेंज का नारा शामिल हो गया है, तो भाजपा को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला है। सरकारों के खिलाफ सड़कों पर आंदोलन करना संवैधानिक अधिकार है। इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा निरस्त किए जाने के बाद आपातकाल के खिलाफ जेपी आंदोलन भी सड़कों पर चला था। अन्ना आंदोलन भी सत्ता परिवर्तन का कारण बना था। हालांकि, इन आंदोलनों की परिस्थितियां और उद्देश्य अलग-अलग थे।
चुनाव आयोग के खिलाफ वोट चोरी के आरोपों को लेकर चल रहे आंदोलन में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित की जाए। जो राजनीतिक दल चुनाव आयोग द्वारा विजयी घोषित किए जाते हैं, वे कुछ राज्यों में सरकार चलाते हैं, लेकिन जहां हारते हैं, वहां वोट चोरी के आरोप लगाते हैं। यह दोहरा मापदंड जनता के मन में सवाल पैदा करता है। हालांकि, चुनावी अनियमितताओं के आरोपों की जांच तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही होनी चाहिए।
लोकतंत्र के असली मालिक मतदाता हैं। राजनीतिक बयान, भाषण और आंदोलन जनमत को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, लेकिन उनका प्रभाव सकारात्मक है या नकारात्मक, इसका अंतिम निर्णय चुनाव में होता है। रिजीम चेंज केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था और उसकी विचारधारा में व्यापक बदलाव का विचार भी है। भारत में सत्ता परिवर्तन का लोकतांत्रिक रास्ता चुनाव ही रहा है।
भाजपा को हिंदुत्व की विचारधारा वाली दक्षिणपंथी पार्टी माना जाता है, जबकि कांग्रेस की राजनीति का आधार अलग रहा है। विचारधाराओं के बीच संघर्ष लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। सरकार की नीतियों और विचारधारा की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन आलोचना और असहमति को हिंसक टकराव में बदलना उचित नहीं है।
जहां तक जनादेश का सवाल है, भाजपा भी चुनावों में उसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत जीतती है, जिसके तहत पहले कांग्रेस सत्ता में आती रही। चुनाव में अधिक मत और सीटें हासिल करने वाली पार्टी को सरकार बनाने का अवसर मिलता है। जनादेश की वैधता का निर्धारण संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होता है, न कि सड़कों पर लगाए गए नारों से।
सरकार की विचारधारा के खिलाफ वातावरण बनना स्वाभाविक है। भाजपा की हिंदुत्व विचारधारा को धार्मिक कट्टरता के रूप में भी देखा जाता है, हालांकि सरकार की नीतियों का मूल्यांकन उनके वास्तविक क्रियान्वयन के आधार पर होना चाहिए। विकास और कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य पात्र नागरिकों तक लाभ पहुंचाना होना चाहिए, न कि किसी खास समुदाय को प्राथमिकता देना। विचारधाराओं का टकराव वैचारिक स्तर पर रहे, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।
निवेशकों को शेयर खरीदने और बेचने के लिए स्टॉक एक्सचेंज एक व्यवस्थित मंच उपलब्ध कराता है। इसी तरह संसदीय व्यवस्था में चुनाव जनादेश के आदान-प्रदान का माध्यम हैं। हर पांच साल में मतदाता अपने विवेक से सरकार चुनते हैं। यही भारत में सत्ता परिवर्तन का लोकतांत्रिक तरीका है।
सरकार और विपक्ष, दोनों की गतिविधियों पर मतदाताओं की नजर रहती है। आंदोलनों से जनता को सरकार की कार्यप्रणाली, विकास, नेतृत्व और नीतियों का आकलन करने का अवसर मिलता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जनता अपने विवेक से विभिन्न पक्षों को परखती है और चुनाव में अपना निर्णय सुनाती है।
न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं पर भरोसा संसदीय व्यवस्था की बुनियाद है। किसी भी चुनावी विवाद का समाधान प्रमाणों, जांच और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। आंदोलन समाधान के लिए हो, तख्तापलट के लिए नहीं। आंदोलन सरकार को सुधारने का माध्यम बने, व्यवस्था को गिराने का औजार नहीं। भारत का लोकतंत्र परिपक्व है। यहां सत्ता परिवर्तन का संवैधानिक रास्ता वोट है, और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।














