भोपाल, 23 अक्टूबर।
मध्यप्रदेश की जेलों में 58 साल पुराने जेल मैनुअल की जगह नया मैनुअल लागू करने की तैयारी है। इसका ड्राफ्ट तैयार हो गया है और सरकार से मंजूरी मिलने के बादइसे साल के अंत तक लागू किया जा सकता है। यह बदलाव केवल किताबी नहीं, बल्कि जेल व्यवस्था की सोच में परिवर्तन का संकेत है। जेल को अब सिर्फ सजा देने की जगह नहीं, बल्कि बंदियों के सुधार और पुनर्वास के केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर है।
नए ड्राफ्ट में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रावधान किया गया है कि परिवार में देखभाल करने वाला कोई अन्य सदस्य नहीं होने पर पात्र बंदी को एक तिहाई सजा पूरी करने के बाद अस्थायी रिहाई मिल सकेगी। चौदह दिन की फरलो और आपातकालीन परिस्थितियों में 48 घंटे की पैरोल का प्रावधान भी किया गया है। आपातकालीन पैरोल के दौरान सुरक्षाकर्मी तैनात रहेंगे।
महिला कैदियों की तरह पुरुष बंदियों को भी छह साल तक के बच्चों को साथ रखने की अनुमति देने का प्रस्ताव है, बशर्ते बाहर उनकी देखभाल करने वाला कोई न हो। इससे बच्चों के हितों की रक्षा और माता-पिता के साथ उनके भावनात्मक संबंध बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
आदतन अपराधी की परिभाषा स्पष्ट करने के साथ विचाराधीन बंदियों को कानूनी सहायता और थर्ड जेंडर बंदियों के लिए अलग बैरक, सुरक्षा तथा मेडिकल जांच की व्यवस्था का प्रावधान भी किया गया है।
सजा पूरी करने के करीब पहुंचे बंदियों को उनकी रुचि के अनुसार कौशल प्रशिक्षण देने की योजना है। आफ्टर केयर सर्विस और खुली जेल की व्यवस्था का विस्तार रिहाई के बाद रोजगार और सामाजिक पुनर्वास के अवसर बढ़ा सकता है।
हालांकि, सुधार और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा। पैरोल और फरलो की पात्रता, निगरानी तथा नियमों का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
58 साल बाद जेल मैनुअल में बदलाव का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब बंदियों को सम्मानजनक जीवन की ओर लौटने का अवसर मिले। नया मैनुअल ईमानदारी से लागू हुआ तो जेलें केवल सजा काटने की जगह नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास के केंद्र बन सकती हैं। यही न्याय की सार्थकता है।













