भोपाल, 23 अक्टूबर।
सरकार ने बारहवीं के मेधावी बच्चों को लैपटॉप के लिए पच्चीस हजार रुपये देना शुरू किया तो मकसद नेक था। गांव के गरीब घर का बच्चा भी तकनीक की दौड़ में पिछड़े नहीं, लेकिन अठारह साल में योजना के नाम और नियम बदल गए, पर पच्चीस हजार का आंकड़ा वहीं का वहीं टिका रहा।
बाजार में तकनीक महंगी हो गई, पढ़ाई का तरीका बदल गया, लेकिन शिक्षा विभाग की फाइल में आज भी 2009 वाला हिसाब चल रहा है। सरकारी आदेश कहता है कि पच्चीस हजार में लैपटॉप खरीद लो, बाजार कहता है कि इतनी रकम में जरूरत के मुताबिक मशीन मिलना मुश्किल है। तकनीकी पढ़ाई के लिए आठ जीबी रैम और 256 जीबी स्टोरेज वाला लैपटॉप चाहिए, जिसकी कीमत चालीस से पचास हजार रुपये है। सोलह जीबी रैम और 512 जीबी स्टोरेज वाला मॉडल साठ हजार से शुरू होकर नब्बे-पचानवे हजार रुपये तक जाता है। यह फासला कौन भरेगा, छात्र या उसका किसान पिता?
इस साल प्रदेश के एक लाख बाईस हजार विद्यार्थियों के खातों में तीन सौ चार करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि भेजी गई। हर बच्चे को पच्चीस हजार रुपये मिले, फोटो खिंची, अखबार में नाम छपा, लेकिन घर पहुंचकर पता चला कि इस पैसे से जरूरत के मुताबिक लैपटॉप खरीदना मुश्किल है। कई परिवारों ने अठहत्तर हजार रुपये तक खर्च किए, कई ने सेकंड हैंड लैपटॉप से काम चलाया, तो कई ने ब्याज पर पैसा उठाया। सम्मान योजना के नाम पर परिवारों पर कर्ज चढ़ गया। यह कैसी प्रोत्साहन योजना है, जो परेशानी बढ़ा दे?
मोबाइल फोन और लैपटॉप के मॉडल लगातार बदल रहे हैं। ऑनलाइन क्लास, प्रोग्रामिंग, डिजाइन और रिसर्च के लिए लैपटॉप जरूरी है। इसके बावजूद शिक्षा विभाग ने बाजार का सर्वे नहीं किया। किसी विक्रेता से नहीं पूछा कि पच्चीस हजार में क्या मिलता है और किसी छात्र से नहीं पूछा कि उसे किस मशीन की जरूरत है। पैसा ट्रांसफर हुआ और योजना पूरी मान ली गई। यही सरकारी कामकाज का सबसे बड़ा रोग है।
आज एआई का युग है। छात्रों को तेज प्रोसेसर, ग्राफिक्स और ज्यादा रैम की जरूरत पड़ सकती है। इंजीनियरिंग सॉफ्टवेयर के लिए अच्छी मशीन आवश्यक है। हर विद्यार्थी के लिए एक जैसा प्रोसेसर जरूरी नहीं, लेकिन न्यूनतम मानक तय होने चाहिए। सरकार हर छात्र को एक ही तराजू में तौल रही है, चाहे वह आर्ट्स पढ़े या कंप्यूटर साइंस। यह बैलगाड़ी की रफ्तार से रॉकेट युग की पढ़ाई कराने जैसा है।
विभाग ने कीमतों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया, तकनीकी और गैर-तकनीकी पाठ्यक्रमों का अंतर नहीं समझा और छात्रों से फीडबैक भी नहीं लिया। थोक खरीद से सस्ते और बेहतर लैपटॉप उपलब्ध कराए जा सकते थे।
सरकार को राशि पच्चीस हजार से बढ़ाकर पचास हजार रुपये करनी चाहिए। तकनीकी पाठ्यक्रमों, जैसे बीटेक, बीसीए और डिजाइन के छात्रों के लिए अलग स्लैब बनाकर साठ हजार रुपये तक का प्रावधान किया जाए। सीधे कंपनियों से थोक खरीद हो और हर दो साल में राशि का पुनर्मूल्यांकन किया जाए।
मेधावी छात्र को लैपटॉप देना सम्मान है, लेकिन अधूरी राशि देकर उसे बाजार में भटकने के लिए छोड़ देना अपमान है। सरकार यदि चाहती है कि गरीब का बच्चा भी इंजीनियर, डिजाइनर और प्रोग्रामर बने, तो उसे मशीन की जरूरत भी समझनी होगी। पच्चीस हजार का आंकड़ा अब केवल फाइल की शोभा है, छात्र की जरूरत नहीं। यही रवैया रहा तो योजना चलती रहेगी, लेकिन उसका उद्देश्य खत्म हो जाएगा और हजारों सपनों पर भारी पड़ेगी विभाग की यह लापरवाही।













