भोपाल, 24 अक्टूबर।
मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की पेंशन को लेकर बहस तेज हो गई है। प्रदेश के करीब साढ़े चार लाख कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की जगह एकीकृत पेंशन योजना (यूपीएस) देने की तैयारी चल रही है। इसके लिए सरकार ने समिति गठित की है, जो दिसंबर तक अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है। कर्मचारी संगठन इस पहल से नाराज हैं और इसे पुरानी पेंशन की बहाली टालने की कोशिश बता रहे हैं। सरकार का तर्क है कि पुरानी पेंशन से राज्य पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है, जो भविष्य में और बढ़ेगा। इसलिए बीच का रास्ता निकालना जरूरी है।
इस विवाद को समझने के लिए तीनों पेंशन योजनाओं का अंतर जानना जरूरी है। पुरानी पेंशन योजना में कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में मिलता था। इसमें कर्मचारी का कोई अंशदान नहीं होता था। पूरी राशि सरकार देती थी और महंगाई राहत के साथ पेंशन बढ़ती थी। यह व्यवस्था वर्ष 2005 से पहले लागू थी।
इसके बाद नई पेंशन योजना (एनपीएस) लागू हुई। इसमें कर्मचारी के वेतन से 10 प्रतिशत और सरकार की ओर से 14 प्रतिशत राशि निवेश की जाती है। सेवानिवृत्ति के बाद जमा राशि के आधार पर पेंशन मिलती है, जो बाजार के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होती है। इसमें निश्चित पेंशन की गारंटी नहीं होने के कारण कर्मचारी संगठन लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं।
एकीकृत पेंशन योजना (यूपीएस) में पात्र कर्मचारियों के लिए निश्चित पेंशन का प्रावधान है। दस वर्ष की सेवा पूरी करने वाले पात्र कर्मचारी को न्यूनतम 10 हजार रुपये मासिक पेंशन देने की व्यवस्था है। वहीं, 25 वर्ष या उससे अधिक सेवा पूरी करने पर अंतिम 12 महीनों के औसत मूल वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन देने का प्रावधान है। इसमें महंगाई राहत का लाभ भी मिलेगा, लेकिन यह व्यवस्था पुरानी पेंशन से अलग है।
राज्य सरकार द्वारा गठित समिति यूपीएस लागू करने से होने वाले वित्तीय भार और कर्मचारियों को मिलने वाले लाभ का अध्ययन कर रही है। इसके लिए दूसरे राज्यों के प्रावधानों का अध्ययन करने के साथ कर्मचारी संगठनों और विशेषज्ञों से भी विचार-विमर्श किया जा रहा है। समिति की रिपोर्ट के बाद सरकार इस पर निर्णय लेगी।
सरकार का तर्क है कि पुरानी पेंशन से भविष्य में खजाने पर भारी बोझ पड़ेगा। दूसरी ओर, कर्मचारियों का कहना है कि सामाजिक सुरक्षा को केवल वित्तीय बोझ के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। यूपीएस में भी सेवा अवधि की शर्तें हैं। कर्मचारियों को आशंका है कि कम सेवा अवधि में नौकरी छोड़ने या मृत्यु होने की स्थिति में परिवार की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है।
मध्य प्रदेश सरकार के सामने चुनौती दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बनाने की है। पुरानी पेंशन बहाल करने से कर्मचारियों को राहत मिल सकती है, लेकिन वित्तीय बोझ बढ़ेगा। यूपीएस लागू करने पर कर्मचारियों की नाराजगी सामने आ सकती है।
समिति को वित्तीय आंकड़ों के साथ मानवीय पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए। वर्षों तक सेवा करने वाला कर्मचारी बुढ़ापे में सम्मानजनक जीवन की उम्मीद करता है। सरकार को पुरानी पेंशन की बहाली पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि यूपीएस लागू की जाती है, तो कर्मचारियों को पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। आज की महंगाई में 10 हजार रुपये की न्यूनतम पेंशन अपर्याप्त है। इसे बढ़ाकर कम से कम 15 हजार रुपये किया जाना चाहिए और महंगाई से जोड़ा जाना चाहिए।
पेंशन केवल पैसे का मामला नहीं, भरोसे का भी मामला है। सरकार को कर्मचारियों के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। इस मुद्दे पर जल्दबाजी के बजाय संवाद और सहमति से फैसला लेना ही सबसे समझदारी भरा कदम होगा।













