एक नेता को बड़े जतन से पार्टी में शामिल किया गया और मंत्री भी बना दिया गया, लेकिन चुनावी मैदान में किस्मत साथ नहीं दी...
एक नेता को बड़े जतन से पार्टी में शामिल कराया गया। माननीय बने बिना ही मंत्री भी बना दिया गया, लेकिन चुनावी मैदान में किस्मत ने साथ नहीं दिया। तब उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि आगे कहीं निगम-मंडल में समायोजन कर दिया जाएगा। समय बीतता गया और वादा फाइलों में ही घूमता रहा। अब एक फैसले के बाद उम्मीद जगी तो माननीय पूरा लव-लश्कर लेकर दिल्ली की याद करने लगे। राजधानी में हलचल भी हुई, लेकिन किस्मत फिर थोड़ी ठिठक गई—सामने वाले को अपील के लिए 15 दिन का समय मिल गया। अब माननीय घड़ी की सुइयों के साथ-साथ उस वादे को भी गिन रहे हैं, जो अभी तक अधूरा है।