राजनीति
04 May, 2026

भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव! वामदल सत्ता से पूरी तरह बाहर होने की कगार पर

केरल के चुनावी रुझानों में वामदलों की कमजोर स्थिति के बीच देश में पहली बार उनके पूरी तरह सत्ता से बाहर होने की स्थिति बनती दिख रही है।

नई दिल्ली, 04 मई।

देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव सामने आता दिख रहा है, जहां केरल विधानसभा चुनाव के मौजूदा रुझानों में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा पिछड़ता नजर आ रहा है। यदि ये रुझान परिणामों में बदलते हैं तो वर्ष 1970 के दशक के बाद पहली बार ऐसा होगा, जब देश के किसी भी राज्य में वामदलों की सरकार नहीं रहेगी। इससे पहले पश्चिम बंगाल में 2011 और त्रिपुरा में 2018 में भी वाम दल सत्ता से बाहर हो चुके हैं। फिलहाल केरल में वे मुख्य विपक्ष की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं।

केरल के ताजा रुझानों के अनुसार कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा बढ़त बनाते हुए सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गया है। वहीं वाम दलों का प्रदर्शन सीमित सीटों तक सिमटता दिख रहा है, जिससे पिनराई विजयन के नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता से बाहर होने के संकेत मिल रहे हैं।

स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दौर में वामपंथी दलों का प्रभाव काफी मजबूत रहा था। 1951-52 के पहले आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विपक्ष में प्रमुख ताकत बनकर उभरी थी। इसके बाद 1957 में केरल में लोकतांत्रिक तरीके से पहली कम्युनिस्ट सरकार का गठन हुआ, जिसने देश की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ा।

पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा लंबे समय तक वामपंथ के मजबूत गढ़ बने रहे। बंगाल में वाम मोर्चा ने 1977 से 2011 तक लगातार सत्ता संभाली, जहां ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नेतृत्व किया। इसी तरह त्रिपुरा में भी वाम दलों का प्रभाव दशकों तक कायम रहा और माणिक सरकार ने लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद संभाला।

राष्ट्रीय राजनीति में भी वाम नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। ज्योति बसु को कई बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, लेकिन पार्टी के निर्णयों के चलते यह संभव नहीं हो सका। वर्ष 1996 में भी उन्हें यह अवसर मिला था, जिसे बाद में उन्होंने पार्टी की ऐतिहासिक भूल बताया।

साल 2004 में वाम दलों ने केंद्र की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन 2008 के बाद उनका प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया। 2011 में पश्चिम बंगाल और 2018 में त्रिपुरा में हार के बाद उनकी स्थिति कमजोर होती चली गई।

पिछले कुछ वर्षों में वाम दलों का जनाधार लगातार घटा है। लोकसभा में भी उनकी सीटों की संख्या कम होती गई और 2024 तक यह संख्या काफी सीमित रह गई। अब केरल ही उनका आखिरी मजबूत आधार माना जा रहा था, लेकिन वर्तमान रुझान वहां भी बदलाव का संकेत दे रहे हैं।

यदि मौजूदा स्थिति बनी रहती है तो यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ होगा, जहां दशकों तक प्रभाव रखने वाले वाम दल पूरी तरह सत्ता से बाहर हो जाएंगे।

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