नई दिल्ली, 16 मई।
भारतीय राजनीतिक इतिहास में 16 मई का दिन एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दर्ज है, जब 1996 के आम चुनावों के बाद सत्ता समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिला और देश में नई राजनीतिक दिशा की शुरुआत हुई। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और सरकार गठन का दावा प्रस्तुत किया।
इसी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच 16 मई 1996 को वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन यह सरकार बहुमत सिद्ध नहीं कर सकी और केवल 13 दिनों में गिर गई, जिसे संसदीय इतिहास का सबसे अल्पकालिक प्रधानमंत्री कार्यकाल माना जाता है।
इसके पश्चात 1998 में मध्यावधि चुनाव कराए गए, जिसमें भाजपा फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सबसे बड़े गठबंधन के रूप में सामने आया। इस जनादेश के आधार पर अटल बिहारी वाजपेयी ने 19 मार्च 1998 को दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की, पर यह सरकार भी लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकी और लगभग 13 महीने बाद इस्तीफा देना पड़ा।
राजनीतिक अस्थिरता का दौर आगे बढ़ा और 1999 में एक बार फिर मध्यावधि चुनाव हुए, जिसमें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 303 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया और सत्ता में वापसी की। इसके बाद वाजपेयी ने 10 अक्टूबर 1999 को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
यह कार्यकाल अपेक्षाकृत अधिक स्थिर रहा और इस दौरान कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए गए, हालांकि कार्यकाल पूरा होने से लगभग छह महीने पहले ही मध्यावधि चुनाव कराने का निर्णय लिया गया, जिसे एक बड़ा राजनीतिक दांव माना गया।
इन सभी घटनाक्रमों ने भारतीय लोकतंत्र में गठबंधन राजनीति के नए युग की नींव रखी और यह स्पष्ट किया कि संसदीय व्यवस्था में जनादेश और राजनीतिक स्थिरता की भूमिका अत्यंत निर्णायक होती है।














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